April 19, 2019
Art-n-Culture

मनवा

कितनी संज्ञाएं जीवन भर हमने ओढ़ी और बिछाईं

रिश्तों के पर नोंचे खोंचे और बहुत की हाथापाई

पलकों पर बैठे सौदागर से सपने यूं सेज सजाकर

और भरम तोड़ा सबने ही आपाधापी से भरमाकर

मन के बैल तोड़ ज़ंजीरें भागे पर न मिली रिहाई

कितनी संज्ञाएं…….

रिश्तों के ……….

आंगन में मनवा के बैठे रिश्ते शतरंजी चालों से

शोर मचाया है जीवन भर बेढंगे बेसुध ख्यालों से

इस मनवा से उस मनवा तक ईर्ष्या के फैलाए जाले

सतरंगी सपनों को तोड़ा एस्नेहएप्रेम को कौन संभाले

फिर भी द्वेष टूट न पाया ओढ़े रहता नरम रजाई

कितनी संज्ञाएं……

रिश्तों के ……….

सत्य न जाने कहाँ खो गया घ् मनवा क्यों बीमार हो गया

तंद्रा टूटी बेचैनी की जीवन भी दुश्वार हो गया

बिछी हुई क्यों मन.आँगन में दुर्गंधों की मैली चादर

चटक गए संबंधों की दीवारें गिरती रहतीं भरभर

सन्नाटों से झोली भर ली, रिश्तों की खो गई कमाई

कितनी संज्ञाएं…..

रिश्तों के …….।।

डॉ प्रणव भारती

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