May 27, 2019
Art-n-Culture

संवाद

जानते हैं न भैया! मन कितना चंचल है। जितना शांत करने की कोशिश करो उतना ही उपद्रव करता है ।किसी को देखकर हम कहते हैं यह अंतर्मुखी है किसी से बात ही नहीं करता तो जो ज़्यादा बोलता है, कचर.पचर करने की कोशिश करता ही रहता है, उसके बारे में हम सोचते हैं यह बाहर्मुखी है क्योंकि वह किसी से भी बतियाता रहता है ।पर मन का मूल स्वभाव तो यह है न भैया ए वह कभी शांत रहता ही नहीं भैया, उसका संवाद ज़ारी रहता है। कभी खुद से, कभी दूसरे से ।
विचारों से भरपूर मन कभी चुप नहीं बैठता अब वो बाहर किसी से बतियाता रहे या ख़ुद से एवो बात अलग है । यही मज़ेदार बात है हमारी, संवाद हमारे मनों में चलता ही रहता है पर कितना सही व गलत हमें कुछ पता ही नहीं होता। जीवन की यही त्रासदी है, हम जो कुछ और जहाँ सोचना होता है , वह नहीं सोच पाते और मन है कि भीतर उत्पात मचाता रहता है ।
क्या यह बेहतर नहीं है कि हम स्वयं से ऐसे संवाद करें जो हमारे व दूसरों के लिए बेहतर जीवन बना सकें
कभी कभी न हम सबको एक दूसरे के विचारों से प्रभावित होकर अपने बारे में सोचने.समझने के लिए विवश हो जाते हैं और कभी.कभी ग़लत निर्णय भी ले बैठते हैं। सो भैया ! बेहतर यही है कि हम खुद से संवाद करें, सोचें, थोड़ा सा दिमाग़ को सही दिशा में ले जाकर गंभीरतापूर्वक अपने भीतर उतरें और अपने निर्णय लें। स्वयं से गंभीर संवाद अपने खुद के लिए ज़रूरी हैं वर्ना मन तो कभी शांत रहता ही नहीं बेशक हम उसे अंतर्मुखी मानें या बाहर्मुखी!
पर्दे में छिपकर रहने पर
क्या कर लेंगे जीवन में
जाएंगे जब जीवन से क्या
तब मुख देखें दर्पण में…
संवादों का राग है जीवन
उत्सव का आभास है जीवन !
तो भैया ! खुश रहें, मन में झाँकें, उससे संवाद करके अपने निर्णय लें और आनंदमय जीवन जीएं।

सस्नेह
डॉ. प्रणव भारती

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