January 27, 2020
Lifestyle

न्यायाधीशों में ईमानदारी और अनुशासन की मिसाल

सर्वोच्च न्यायालय के इतिहास में सम्भवत: ऐसा पहली बार हुआ है कि एक प्रशासनिक अधिकारी ने न्यायालय के आदेश में परिवर्तन करने का दुस्साहस किया। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने इस मामले में छानबीन करवाई और एक ही दिन में ऐसे दुस्साहस की निन्दा करते हुए दोषी अधिकारी को नौकरी से हटा भी दिया गया। यह एक घटना सारे देश के प्रशासनिक भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए पर्याप्त प्रेरणा और मार्ग उपलब्ध कराती है। जिस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने एक भ्रष्ट अधिकारी के विरुद्ध निर्णय लेने में एक क्षण भी व्यर्थ नहीं किया और छानबीन सहित नौकरी से हटाने की सज़ा का निर्णय एक ही दिन में लागू कर दिखाया, क्या इसी प्रकार देश के सभी सरकारी कार्यालयों तथा अन्य संस्थानों में इसी गति से कार्यवाही सम्पन्न नहीं की जा सकती? सर्वोच्च न्यायालय के सर्वोच्च अधिकारी के रूप में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के द्वारा निर्णय लेने का यह तौर-तरीका केवल एक ही केन्द्रीय लक्षण को सिद्ध करता है कि मुख्य न्यायाधीश भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता को एक क्षण के लिए भी बर्दाश्त नहीं करना चाहते। उनका यह लक्षण यह भी सिद्ध करता है कि वे स्वयं भी एक ईमानदार और अनुशासित जीवन में विश्वास रखने वाले व्यक्तित्व से परिपूर्ण हैं। इसके विपरीत सामान्यत: हम किसी भी कार्यालय, मंत्रालय या अन्य संस्थान में यह देखते हैं कि भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता के एक-दो मामलों की तो कोई परवाह ही नहीं करता, बल्कि जब भी कोई सरकारी कर्मचारी भ्रष्टाचार में लिप्त होता है तो वह उस भ्रष्टाचार की राशि का बंटवारा अपने उच्चाधिकारियों के साथ भी करता ही है। इसीलिए कोई उच्चाधिकारी भ्रष्टाचार के मामलों में किसी कार्यवाही के लिए तैयार नहीं होते। जब भ्रष्टाचार सिर से ऊपर बहने लगता है तो भ्रष्ट कर्मचारी को निलम्बित करके छानबीन कार्यवाही प्रारम्भ कर दी जाती है। निलम्बन की अवधि में भ्रष्ट कर्मचारी बिना काम किये अपने वेतन का एक बड़ा हिस्सा प्राप्त करता रहता है और बाहर कोई भी अतिरिक्त कार्य करके अपनी आय बढ़ाने में सफल हो जाता है। दूसरी तरफ कई वर्ष चलने वाली छानबीन की कार्यवाही में क्या होगा या क्या नहीं होगा, इस बात से बेपरवाह उस अधिकारी को कभी भी अपने किये का पछतावा नहीं होता। कई बार तो छानबीन प्रक्रिया में भी भ्रष्टाचार का चढ़ावा देकर वह पुन: नौकरी पर बहाल हो जाता है। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की तरह यदि सरकारी विभागों में भी उच्चाधिकारी ईमानदार हों तो उनके लिए यह उदाहरण एक बहुत बड़ा हथियार बन सकता है जिसके माध्यम से वे तत्काल भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्यवाही करके अपने-अपने कार्यालय में ईमानदारी और अनुशासन की स्थापना कर सकते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय में ही दूसरी बड़ी घटना तो इससे भी अधिक चौंकाने वाली थी। किसी व्यक्ति ने स्वयं को सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई का निजी सचिव एच.के. जुनेजा बताते हुए तेलंगाना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश राधाकृष्णन तथा कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश नारायण स्वामी को टेलीफोन के माध्यम से कुछ विशेष व्यक्तियों का नाम उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में सिफारिश करके भेजने के लिए कहा। इतना ही नहीं उस बहुरुपिये व्यक्ति ने इन दोनों उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को यह भी कहा कि भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई भी उनसे बात करना चाहते हैं। इसके बाद उसी व्यक्ति ने रंजन गोगोई की आवाज़ में वही निर्देश इन दोनों उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को दिये। इस घटना का पता चलते ही मुख्य न्यायाधीश श्री रंजन गोगोई ने प्राथमिक छानबीन करवाई तो पता लगा कि किसी व्यक्ति ने अपने मोबाईल से एक विशेष प्रकार के सॉफ्टवेयर का प्रयोग करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के लैण्डलाईन बोर्ड के माध्यम से अपनी कॉल उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को मिलाई। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के पास फोन कॉल सर्वोच्च न्यायालय के टेलीफोन बोर्ड से पहुँची थी। मुख्य न्यायाधीश ने इस घटना को लेकर भी तुरन्त एक उच्च स्तरीय बैठक करके विस्तृत छानबीन के आदेश दिये हैं। इतना ही नहीं उन्होंने सभी उच्च न्यायालयों के समस्त न्यायाधीशों को यह निर्देश जारी कर दिया है कि उनके नाम पर आने वाली किसी भी टेलीफोन कॉल को वे महत्त्व न दें। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने एक प्रकार से इस निर्देश के माध्यम से अपने ऊपर स्वयं ही एक अंकुश लगा दिया है कि वे कभी किसी उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को टेलीफोन के माध्यम से किसी प्रकार का कोई निर्देश नहीं देंगे।
लेकिन इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इससे पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीश उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को टेलीफोन के माध्यम से यथा सम्भव निर्देश जारी करते रहे हैं। सभी उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति की सिफारिश सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा ही की जाती है, परन्तु इससे पूर्व सम्बन्धित उच्च न्यायालय न्यायाधीश बनने के योग्य व्यक्तियों की सिफारिश सर्वोच्च न्यायालय को भेजता है। सर्वोच्च न्यायालय की दूसरी सिफारिश के बाद केन्द्र सरकार अर्थात् राष्ट्रपति के द्वारा सम्बन्धित व्यक्ति की नियुक्ति का आदेश जारी किया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने तो सभी उच्च न्यायालयों को यह निर्देश जारी कर दिया है कि उनके नाम से किसी टेलीफोन निर्देश को महत्त्व न दिया जाये। परन्तु क्या यह व्यवस्था भविष्य में आने वाले सभी मुख्य न्यायाधीश जारी कर पायेंगे? वैसे उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश नियुक्त करने की प्रक्रिया को पूरी तरह से नियमबद्ध और पारदर्शी बनाने की माँग लम्बे समय से चलती आ रही है, परन्तु न तो सर्वोच्च न्यायालय ने कभी इस माँग को स्वीकार किया है और न ही केन्द्र सरकार ने इस प्रक्रिया को लागू करने में कोई रुचि दिखाई। इसी का परिणाम है कि सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीशों या केन्द्र सरकार के गुप्त टेलीफोन निर्देशों के आधार पर ही उच्च न्यायालयों के द्वारा न्यायाधीश नियुक्त होने की सिफारिशों की प्रक्रिया सम्पन्न हो जाती है। ऐसी प्रक्रिया के माध्यम से केवल चहेते व्यक्तियों को ही उच्च न्यायालयों का न्यायाधीश नियुक्त किया जाता है। उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश पद पर नियुक्ति के लिए ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है कि जिसमें विधिवत रिक्त स्थानों की सार्वजनिक घोषणा की जाये, लिखित और मौखिक परीक्षा पारदर्शी तरीके से सम्पन्न की जाये और ईमानदार तथा योग्य लोगों को उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश के रूप में पदासीन होने के अवसर प्राप्त हों।

vimal vadhawan
Advocate in supreme court
vimalwadhawan@yahoo.co.in

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