June 17, 2019
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अरुंधति रॉय ष्एक था डॉक्टर एक था संत का लोकार्पण

प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय की नई किताब एक था डॉक्टर एक था संत का लोकार्पण कॉन्स्टिट्यूशन क्लबए रफ़ी मार्ग एनई दिल्ली में हुआ। इस मौके पर वक्ताओं में पत्रकार उर्मिलेश उर्मिल, दिलीप मंडल, दिल्ली सरकार में मंत्री राजेन्द्र पाल गौतम, दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर अनीता भारती, राजनेता मनीषा बांगर, सुनील सरदार, अनिल यादव जयहिंद मौजूद थे और कार्यक्रम का संचालन रतन लाल ने किया। एक था डॉक्टर एक था संत उपन्यास अंग्रेजी एवं हिंदी दोनों भाषाओँ में प्रकाशित किया गया है राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक का हिंदी अनुवाद अनिल यादव जयहिंद और दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर रतन लाल ने किया है।
इस पुस्तक में भारत में जातिगत पक्षपात, पूंजीवाद, पक्षपात के प्रति आंख मूंद लेने की आदत, आम्बेडकर की बात को गांधीवादी बुद्धिजीवियों द्वारा खंडन और संघ परिवार का हिंदू राष्ट्र तक लिखा है। भारत में असमानता को समझने और उससे निपटने के लिएए अरुंधति रॉय ज़ोर दे कर कहती हैं कि हमें राजनीतिक विकास और गांधी का प्रभाव, दोनों का ही परीक्षण करना होगा। सोचना होगा कि क्यों डॉ भीम राव आम्बेडकर द्वारा गांधी की लगभग दैवीय छवि को दी गई प्रबुद्ध चुनौती को भारत के कुलीन वर्ग द्वारा दबा दिया गया।
अरुंधति रॉय के विश्लेषण में, हम देखते हैं कि न्याय के लिए आंबेडकर की लड़ाई, जाति को सुदृढ़ करनेवाली नीतियों के पक्ष में, व्यवस्थित रूप से दरकिनार कर दी गई, जिसका परिणाम है वर्तमान भारतीय राष्ट्र जो आज ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र है, विश्वस्तर पर शक्तिशाली है, लेकिन आज भी जो जाति व्यवस्था में आकंठ डूबा है।
लोकार्पण मौके पर उपस्थित लेखिका अरुंधति रॉय ने कहा इस पुस्तक का विषय काफी सवेंदनशील है यह आम्बेडकर पर एक विस्तार विश्लेषण हैं, इस पुस्तक में आंबेडकर और गाँधी की तुलना नही की गयी है यह एक कहानी है कि कैसे एक वर्ग के व्यक्ति को समाजिक और राजनातिक तौर पर नजरअंदाज किया गया।
अरुंधति ने कहा इस पुस्तक में गाँधी और आम्बेडकर के संवादों को ज्यों का त्यों रखा गया है
पुस्तक के सह. अनुवादक रतन लाल इतिहास ने आम्बेडकर के साथ बर्बरता पूर्ण व्यवहार किया गया, इतिहास ने आम्बेडकर के लेखों को दुनिया के नजऱों से छिपा दिया मगर फिर भी आम्बेडकर के मानने वालों ने उन्हें अपने दिलों में जिन्दा रखा।

अनुवादक अनिल यादव जयहिंद ने अपने इस पुस्तक पर अनुभव साझा करते हुए कहा हमारे देश को एक सामाजिक क्रांति की जरूरत है और ह क्रांति पढऩे से आती है, अरुंधती की यह पुस्तक इस देश में क्रांति ला सकती है, जब अंग्रेजी में इस पुस्तक को पढ़ा तो झकझोर दिया था अनुवाद करते वक्त को प्रयास रहा कि सरल शब्दों का प्रयोग किया जाय अरुंधति के पुस्तकों का अनुवाद करना कठिन है क्योकि इनके एक शब्द के कई अर्थ होते हैं हमने पूरी कोशिश की है कि लेखनी में हमारी अपनी भावनाएं ना झलके।


समाजिक कार्यकर्ता एवं राजनीति में सक्रिय मनीषा बांगर ने अपने वक्ततव्य में कहा इस उपन्यास का हिंदी संस्करण उत्तर भारत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तर भारत में आम्बेडकर को बहुत ही कम पढ़ा जाता है, क्योंकि यहां गांधीवादीओं का बोलबाला है यह इस देश का दुर्भाग्य है कि जो व्यक्ति उत्पादनों के राष्ट्रीयकरण की बात करता था उसकों को महत्ता नही देता और जो लोग ब्राह्मणवाद और जातिवाद को तरजीय देने वाले थे वो आज देश के लिए सर्वोच्च हैं आम्बेडकर को समझना है तो गांधी और गांधीवाद को ख़त्म करना होगा गाँधी द्वारा ही जातिवाद और ब्रामणवाद विदेशों में फैलाया गया था।
वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश उर्मिल ने पुस्तक पर बोलते हुए कहा लेखिका किस तरह के सामाजिक विषयों और प्रथाओं पर लिखती है वह अनुकरणीय है, इस पुस्तक से हिंदी पाठक प्रेरित होंगे आंबेडकर को हिंदी क्षेत्र में स्थापित करने का अगर श्रेय किसी को जाता है वह कांशीराम को जाता है, कांशीराम ने उन्हें उत्तर भारत में स्थापित किया था।
दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर अनीता भारती ने किताब के सम्बन्ध में अपने विचार मुखर स्वर में व्यक्त किये उन्होंने कहा गाँधी जी के अफ्रीका मूवमेंट को इस पुस्तक में बखूबी दर्शाया गया है गांधी जी के अफ्रीका के अश्वेतों के प्रति घृणा और अफ्रीका के लोगों के साथ मिलकर अश्वेतों के प्रति कैसे साजिश रची थी यह इस पुस्तक में है भारत में सवर्णों की दलितों के प्रति घृणा के पोषक गाँधी ही थे आम्बेडकर महिलाओं के हिमायती थे वहीं गाँधी महिलाओं को एक वस्तु के रूप में देखते थे।
दिल्ली सरकार में सामाजिक न्याय विभाग के राजेन्द्र पाल गौतम इस पुस्तक के माध्यम से लेखिका ने आम्बेडकर ज्ञान का समावेश कर दिया है।

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