July 16, 2019
Health

कार्टिलेज रिजेनरेशन

खराब होने पर प्राकृतिक जोड़ बदले नहीं बल्कि ठीक किए जाएंगे

घुटने या शरीर के अन्य जोड़ों में चोट लगने पर सबसे अधिक और सबसे पहले कार्टिलेज ही क्षतिग्रस्त होते हैं। अक्सर मामुली चोट लगने पर भी कार्टिलेज को नुकसान पहुंचता है लेकिन लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते हैं। जब उन्हें चलने.फिरने में दिक्कत होने लगती है तब वे इलाज के लिए आर्थोपेडिक विशेषज्ञों के पास पहुंचते हैं लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी होती है और चोट से कार्टिलेज को होने वाला नुकसान काफी बढ़ चुका होता है। जोड़ों की हड्डियों को आपस में जोडऩे वाले कार्टिलेज हमारे शरीर का बहुत ही महत्वपूर्ण संरचना है। यह मजबूत उतक टिश्यू होते है लेकिन हड्डियों की तुलना में अधिक मुलायम एवं लचीले होते हैं। कार्टिलेज विशिष्ट कोशिकाओं से बने होते हैं जिन्हें कोंड्रोसाइट्स कहा जाता है और ये कोशिकाएं बहुत अधिक मात्रा में कॉलेजन फाइबर] प्रोटियोग्लाकैन और इलास्टिन फाइबर से बने एक्स्ट्रासेलुलर मैट्रिक्स यौगिक उत्पादिक करती हैं। हालांकि कार्टिलेज के उतक में अपनी खुद की मरम्मत करने की क्षमता होती है लेकिन इसमें यह क्षमता बहुत ही सीमित होती है क्योंकि इसमें रक्त कोशिकाएं नहीं होती है जबकि ठीक होने की प्रक्रिया के लिए रक्त जरूरी होता है।
जोड़ों में पाया जाने वाला कार्टिलेज यानि आर्टिकुलर कार्टिलेज चिकना होता है। कार्टिलेज जोड़ों को मजबूती से जोड़कर रखता है। कार्टिलेज अगर सही सलामत हो तो हमारे लिए चलना फिरना आसान हो जाता है। कार्टिलेज के कारण जोड़ों की हड्डियां एक दूसरे से रगड़ नहीं खाती है। जब कार्टिलेज घिस जाता है तो हड्डियां एक दूसरे से टकराती हैं जिससे हमारे लिए चलना फिरना मुश्किल हो जाता है।
आर्टिकुलर कार्टिलेज चोट लगने से या सामान्य रूप से घिसने के कारण क्षतिग्रस्त होता है। चूंकि कार्टिलेज अगर एक बार क्षतिग्रस्त हो जाए तो अपने आप ठीक नहीं होता है इसलिए चिकित्सकों ने नए कार्टिलेज के विकास को त्वरित करने के लिए षल्य तकनीकें विकसित की। कार्टिलेज के पुनर्निमाण से मरीज को दर्द से मुक्ति मिलती है और उसके लिए चलना . फिरना आसान हो जाता है और इसके अलावा आर्थराइटिस होने से रोका जा सकता है।
किसी जोड़ की सतह के मुख्य घटक एक विशेष उतक होते हैं जिसे हाइलीन कार्टिलेज कहा जाता है। जब यह क्षतिग्रस्त हो जाता है तो जोड़ों की सतह चिकनी नहीं रह जाती है और हड्यिं आपस में रगड़ खाती है जिससे जोड़ों को और अधिक नुकसान पहुंचता है और चलने.फिरने में काफी दर्द होता है। कार्टिलेज के क्षतिग्रस्त होने से जोड़ों में आर्थराइटिस हो सकती है।
अक्सर कार्टिलेज के खराब होने पर या घुटने में आर्थराइटिस या ओस्टियोआर्थराइटिस होने पर जब मरीज का चलना.फिरना दूभर हो जाता है तो घुटने या अन्य जोड़़ों में इम्प्लांट लगाने की जरूरत पड़ती है जिसके लिए ज्वाइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी करनी पड़ती है लेकिन अब कार्टिलेज रिजेनरेशन की नई तकनीकों की बदौलत जोड़ को बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी। कार्टिलेज पुनर्निर्माण के लिए आज अनेक तकनीकों का उपयोग हो रहा है और अनुसंधानकर्ता कार्टिलेज को उत्पन्न करने की नई विधियों का विकास करने का प्रयास कर रहे हैं ताकि लोगों को ओस्टियो आर्थराइटिस के दर्द से मुक्ति मिले और वे अपने प्राकृतिक जोड़ों के साथ ही लंबा जीवन जी सकें।

आटोलोगस कार्टिलेज प्रत्यारोपण

इंडियन कार्टिलेज सोसायटी यानि आईसीएस के वर्तमान अध्यक्ष तथा नई दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो हास्पीटल के ज्वाइंट रिप्लेसमेंट सर्जन डॉ. राजू वैश्य बताते हैं कि पिछले दो दशक के दौरान क्षतिग्रस्त कार्टिलेज के इलाज के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। आटोलोगस कार्टिलेज प्रत्यारोपण एसीआई कारगर उपचार के रूप में तेजी से विकसित हुआ है। इसके तहत मरीज के शरीर से स्वस्थ कार्टिलेज के एक छोटे हिस्से का उपयोग किया जाता है। इस टुकड़े को अलग करके कार्टिलेज निर्माण करने वाली विशेष कोशिकाओं, जैसे कोंड्रोसाइट्स को मल्टीप्लाई किया जाता है और इसे खराब क्षेत्र में प्रत्योरोपित कर दिया जाता है। खराब क्षेत्र में प्रत्यारोपित होने के बाद यह सुदृढ़ जेल का रूप ले लेता है। इसकी सफलता दर बहुत अधिक है और सभी जोड़ों में कार्टिलेज समस्याओं का उपचार किया जा सकता है। इसमें दोबारा किसी सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती है। मरीज छह से आठ माह के भीतर अपनी सभी गतिविधियां करने लगता है और वे खेलों में भी भाग लेने लगते हैं। इस विधि के माध्यम से जोड़ों की संरचनाए उसका कार्यकलाप एवं बायोमेकेनिक्स पूरी तरह से पूर्व की तरह बहाल हो जाते हैं और इस कारण दोबारा आर्थराइटिस होने की जरूरत खत्म हो जाती है। यह विधि चिकित्सा बीमा के दायरे में आती है।
एसीआई तकनीक का आविष्कार स्वीडन के गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय में 1987 में डॉ. लार्स पिटरसन एवं डॉ. मैट्स ब्रिटबर्ग ने किया था। पिछले 20 सालों में घुटने, टखने, जांघ और कंधे की समस्या से पीडि़त 40 हजार से अधिक मरीजों का इलाज किया जा चुका है। अध्ययनों से पता चलता है कि इस तकनीक से इलाज कराने वाले मरीजों को काफी हद तक दर्द से निजात मिला तथा उनकी रोजमर्रा की गतिविधियों में काफी सुधार आया।

एसीआई की प्रक्रियाएं

इस तकनीक के तहत दो चरणों की प्रक्रिया शामिल है। इसमें नई कार्टिलेज कोषिकाएं उगाई जाती है और इसके बाद क्षतिग्रस्त कार्टिलेज के जगह प्रत्यारोपित किया जाता है। सबसे पहले शरीर की वैसी स्वस्थ जोड़ से स्वस्थ कार्टिलेज को लिया जाता है जिस जोड़ को भार उठाना नहीं पड़ता है। यह आथोस्कोपी प्रक्रिया के जरिए किया जाता है। स्वस्थ कार्टिलेज कोशिकाओं अथवा कोंड्रोसाइट्स से युक्त स्वस्थ उतक को प्रयोगशाला में भेजा जाता है जहां कोशिकाओं का संवर्धन किया जाता है। इसमें तीन से पांच सप्ताह का समय लगता है और इस बीच कोशिकाओं की संख्या काफी बढ़ जाती है। अब संवर्धित कोशिकाओं को आर्थोस्कोपी प्रक्रिया की मदद से क्षतिग्रस्त हिस्से में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है।
यह तकनीक युवा मरीजों के लिए खास तौर पर उपयोगी है। यह उस स्थिति में लाभदायक है जब कार्टिलेज की क्षति बहुत अधिक नहीं हो। इसमें चूंकि मरीज के खुद की कोशिकाओं का उपयोग किया जाता है इसलिए इस बात का खतरा नहीं होता है कि शरीर प्रत्यारोपित उतक को अस्वीकार कर देगा। इस तकनीक के साथ दिक्कत यह है कि इसमें कई सप्ताह का समय लगता है और यह दो चरणों की प्रक्रिया है और दो बाद मरीज के जोड़ में आर्थोस्केपी करनी पड़ती है।
यह तकनीक युवा मरीजों के लिए खास तौर पर उपयोगी है। यह उस स्थिति में लाभदायक है जब कार्टिलेज की क्षति बहुत अधिक नहीं हो। इसमें चूंकि मरीज के खुद की कोशिकाओं का उपयोग किया जाता है इसलिए इस बात का खतरा नहीं होता है कि शरीर प्रत्यारोपित उतक को अस्वीकार कर देगा। इस तकनीक के साथ दिक्कत यह है कि इसमें कई सप्ताह का समय लगता है और यह दो चरणों की प्रक्रिया है और दो बाद मरीज के जोड़ में आर्थोस्केपी करनी पड़ती है।
कार्टिलेज की खराबी को दूर करने के लिए कई अन्य प्रक्रियाओं की भी मदद ली जाती है जिनमें एक है ओस्टियोकोंड्रियल आटोग्राफ्ट प्रत्यारोपण और दूसरी प्रक्रिया है ओस्टियोकांड्रयल आलोग्राफ्ट प्रत्यारोपण।

ओस्टियोकोंड्रियल आटोग्राफ्ट प्रत्यारोपण

इस तकनीक में कार्टिलेज को शरीर की एक जोड से दूसरी जोड़ में स्थानांतरित किया जाता हैं। जोड़ के उस हिस्से से स्वस्थ कार्टिलेज उतक यानि ग्राफ्ट को लिया जाता है, जिस हिस्से को भार नहीं उठाना पड़ता है। इसके बाद क्षतिग्रस्त क्षेत्र की सतह से इसका मिलान किया जाता है और उस जगह पर प्रत्यारोपित किया जाता है। इससे उस जोड़ की सतह पर चिकनी कार्टिलेज निर्मित हो जाता है।
यह तकनीक छोटी कार्टिलेज क्षति के लिए उपयोग में लाई जाती है। इसका कारण यह है कि किसी एक ही जोड़ के सीमित हिस्से से सीमित मात्रा में ही स्वस्थ उतक को लिया जा सकता है।

ओस्टियोकांड्रयल आलोग्राफ्ट प्रत्यारोपण

अगर कार्टिलेज की क्षति बहुत अधिक है तो आलोग्राफ्ट तकनीक का सहारा लेना पड़ता है। किसी कैडेवर दाता से उत्तक लिया जाता है। इसके बाद प्रयोगशाला में इसे रोगाणुमुक्त यानि स्टरलाइज किया जाता है। उसकी जांच की जाती है ताकि यह पता चले कि उससे किसी रोग का संचरण होने का खतरा तो नहीं है। इसके बाद क्षतिग्रस्त कार्टिलेज के आकार के समान इसके आकार दिया जाता है और क्षतिगस्त कार्टिलेज के स्थान पर प्रत्यारोपित कर दिया जाता है।

स्टेम कोशिका एवं टिश्यू इंजीनियरिंग

नवीनतम अनुसंधानों से इस बात की संभावना बनी है कि शरीर खुद ही स्वस्थ कार्टिलेज उतक को विकसित करे। नए अनुसंधानों की बदौलत कार्टिलेज रिजेनरेशन अथवा रेस्टोरेशन की नई तकनीकों की मदद से आने वाले समय में घुटने, कूल्हे और कंधे जैसे जोड़ों के खराब होने पर उन्हें बदले जाने के बजाए उन्हें ठीक किया जाएगा। कार्टिलेज रिजेनरेशन एवं रिस्टोरेशन की नई तकनीकों से अब उम्मीद जगी है कि ओस्टियो आर्थराइटिस एवं अन्य कारणों से खराब होने वाले घुटने एवं अन्य जोड़ों को बदलना नहीं पड़े बल्कि प्राकृतिक जोड़ों को ही ठीक कर दिया जाए।
भारतीय मूल के स्टेम सेल वैज्ञानिक प्रो.डा.ए ए शेट्टी के अनुसार वर्तमान समय में अस्थि चिकित्सा के क्षेत्र नई तकनीकों के विकास होने के बाद से खराब जोड़ों के स्थान पर कृत्रिम जोड़ लगाने के बजाए जोड़ों के उतकों को रिजेनरेट करके प्राकृतिक जोड़ों को बचा लिया जाए। हाल के दिनों में विकसित कार्टिलेज रिजेनरेशन तकनीकों से प्राकृतिक कार्टिलेज बनाने में मदद मिलती है और इस कारण जोड़ों को बदलने की जरूरत या तो खत्म हो जाती है या टाली जा सकती है। इस तरह की तकनीक खास तौर पर उन युवाओं के लिए काफी फायदेमंद साबित होगी जिनके घुटने या अन्य जोड़ कार्टिलेज के क्षतिग्रस्त होने या आर्थराइटिस के कारण खराब हो गए हैं। प्रो. शेट्टी ब्रिटेन में रह रहे हैं और कैंटेबरी क्रिश चर्च यूनिवर्सिटी में स्टेम सेल अनुसंधान के निदेशक हैं। कार्टिलेज रिजनरेशन की नई तकनीक के तहत प्रयोगशाला में मरीज की खुद की कोशिका की मदद से क्षतिग्रस्त हड्डी या कार्टिलेज को ठीक किया जाता है। सबसे पहले मरीज की कोशिकाओं को प्रयोगशाला में सवंर्धित किया
जाता है और मरीज के प्रभावित अंग में इंजेक्ट कर दिया जाता है जो मरीज की रूग्न या क्षतिग्रस्त कोशिका को हटाकर विकसित होने लगती है और प्रभावित अंग दोबारा काम करने लगता है। इसमें कीहोल प्रक्रिया के जरिए मरीज की जोड़ से स्वस्थ्य कार्टिलेज का छोटा सा हिस्सा लिया जाता है और प्रयोगशाला में एक खास विधि के जरिए उसे स्टेम सेल में बदल दिया जाता है और इसके बाद मरीज के क्षतिग्रस्त जोड़ में इंजेक्ट कर दिया जाता है।
डा. राजू वैश्य के अनुसार रिजेनरेटिव कोशिका थिरेपी को अमरीका के फूड एवं औषधि प्रशासन से मंजूरी मिल चुकी है और भारत के कुछ अस्पतालों में इस थेरेपी का उपयोग शुरू हो गया है और आने वाले समय में इस तकनीक के इस्तेमाल में तेजी आने की उम्मीद है। इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में अब तक 10 मरीजों का इलाज हो चुका है। उम्मीद है कि कुछ वर्षों में घुटने एवं अन्य जोड़ों को बदलने की सर्जरी बीते दिनों की बात हो जाए और वृद्धावस्था में भी लोगों के घुटने एवं अन्य जोड़ युवावस्था की तरह काम करे। जिन अस्पतालों में इस तकनीक का उपयोग हो रहा है उनमें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एवं सफदरजंग अस्पताल भी शामिल है।
हालांकि मौजूदा समय में यह तकनीक मंहगी है लेकिन आने वाले समय में इसके सस्ती होने की उम्मीद है। यह तकनीक केवल उन मरीजों के लिए उपयोगी नहीं है जिनके घुटने बहुत अधिक क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। इसके अलावा इस तकनीक के साथ यह दिक्कत है कि इस तकनीक में मरीज का इलाज परम्परागत उपचार तकनीकों की तुलना में अधिक लंबा होता है क्योंकि कोशिका संवंधन में समय लगता है। लेकिन इस तकनीक में सुधार लाने के लिए प्रयास जारी हैं और उम्मीद है कि समय के साथ यह तकनीक अधिक से अधिक विकसित होगी।

Writer – Mr Vinod Kumar

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