June 17, 2019
Art-n-Culture

संवाद

पता नहीं अचानक क्या हुआ, देखते ही देखते विदेशी लोगों की दनादन फ्रैैंड रिक्वेस्ट आने लगीं। पहले तो जाने दो वाली फीलिंग से नजऱअंदाज किया पर जब लगातार आती रहीं तो दिल सोचने लगा हम तो बड़े तीसमारखां हैं जी, हमें तो विदेशी भी पढ़ते हैं, फिर कुछ सोचा तो दिमाग़ बोला हम बहुत बड़े मूर्ख हैं, भैया! इनके पास हमारी भाषा का ज्ञान, उसकी पहचान भी है जो ये हमें पढऩा चाहेंगे।
फिर ये सोचकर दिल को तसल्ली हुई चलो हमारा चेहरा.मोहरा तो ऐसा है कि लोग हमें देखकर खुश हो सकें। अपने मुस्काते चेहरे पर हमें गुमान हो आया, ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया ।पर ये क्या….यहाँ तो युवाओं की लाइन लग गई। बड़ी कोफ़्त हुई।अब इस उम्र में क्या ….
अभी चार दिन पहले भैया, एक फ्रेंड रिक्वेस्ट पर निगाह पड़ी, लगा तो कोई हिंदुस्तानी था एनाम भी हिंदी, शक्ल कुछ अंग्रेज़ की सी लग रही थी। प्रोफ़़ा़इल पर जाकर देखा, पच्चीस वर्ष लगभग नौजवान, पहचान वाली हिंदी प्रोफ़सर का मित्र था। स्वीकार कर ली फ्रड रिक्वेस्ट और भैया एमैसेंजर पर जन्मपत्री निकालने लगा। पूछ ही तो लिया, क्या कॉमन इंटरेस्ट हो सकता है, हिंदी पढऩी आती नहीं, पैदा हुए इंग्लैंड में।
हो सकता है इन नौजवानों का इंटरेस्ट हमारी औलादों में होएपर वो भी तो सब सैटल्ड !
नमस्ते करी उसे और लगा एक किला फ़तह किया।अभी और बहुत से किले फ़तह करने बाकी हैं।अब इस विदेशी फ्रैैंड लिस्ट को या तो पूरी डीलिट कर दूं एया पूछ लूं..भैया! हमारी मित्रता किस बेस पर टिकी रहेगी।
अब डीलिट करने में भी तो दूसरे की बेज़्जती होने का ख़तरा है न… आप ही बताइए भैया! आखऱि किया क्या जाए।
दोस्त मिलते हैं बहुत मुश्किल से मगऱ
दोस्ती में कुछ तो एक सा मिले।

                                 डॉ. प्रणव भारती

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