August 21, 2019
Art-n-Culture

संवाद

तेरी-मेरी कहानी ! जैसे धूप-छाँह या पानी ! कोई भ्रम पालने की ज़रूरत कहाँ होती है।ज़िंदगी कभी हँसती ,कभी रोती है।कभी खिलखिलाती है तो भैया कभी दिल भी निकाल कर ले जाती है और हम बिना दिल के ही जिंदा रहते हैं।घुटते रहते हैं अंदर ही अंदर और फुस्स होकर रह जाते हैं।नहीं लगता कभी-कभी कि हम एक ऐसे संसार में जी रहे हैं जहाँ संवेदनाओं की कोई महत्ता ही नहीं है 7 हम जीते हैं क्योंकि कोई और उपाय नज़र नहीं आता ,स्यूसाइड हम क्र नहीं सकते ,भागना नहीं है न जीवन से 7 जाने कितनी लाख योनियों के बात ये मनुष्य का जीवन मिला है 7 अब उसे खोने का मतलब ? वैसे तो पता नहीं —पर भइया हम मतलब निलकते तो रहते हैं ,अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार !
कल ही की बात ले लो —-अच्छे -खासे जा रहे थे लोग ,अपने-अपने काम पर ,ज़रा सा टकरा क्या गई गाड़ियाँ ,तलवारें निकल आईं 7 रास्ते में भीड़ जमा हो गई वो अलग ! तमाशाइयों ने हो-हल्ला करना शुरू कर दिया ,किसीको न तो कोई चोट लगी थी ,न ही कोई ऎसी दुर्घटना हुई थी जिससे किसी की कोई हानि हुई हो 7 समझो भैया! बस हल्के हवा के झौंके सी टकरा गईं थीं गाड़ियाँ —और शोर ! दुनिया भर का ! जैसे आसमान ज़मीन पर आ गिरा हो ,जैसे पैरों के नीचे से रेत निकल गई हो.जैसे सरे आम किसीकी इज़्ज़त लुट रही हो ! अच्छा भैया ! कभी किसी ज़रूरतमंद के लिए इतना शोर करते देखा है किसीको —? सड़क पर गिरे हुए आदमी को भी उठाने से कतराते नहीं हैं लोग ? और फालतूओं की भीड़ लग भी जाए तो उस बेचारे को तो कोई ऐसा ही बंदा उठाने जाएगा जिसके दिल में अभी पत्थर फ़िट न हो गया हो ,बाकी तो सब ऐसे भाग जाएंगे जैसे गधे के सर से सींग !
गाड़ियाँ टकराईं तो उसमें और किसीका कोई दोष नहीं ,हमारा ही दोष तो है —हम जहाँ पुलिस का मुखड़ा दिखाई नहीं देता वहाँ ट्रैफ़िक के कितने नियमों का पालन करते हैं ? अपने पिता का साम्राज्य समझते हैं ,और उन्हीं की सड़क या गली —जो भी हो 7 नियमों का पालन हम न करें,गाली दें दूसरों को और तमाशा देखे फालतू में ऐसे लोग जो ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे ‘ और ख़ुद पर जब आए तो भइया तौबा —-
हम ,वो लोग हैं जो विदेशों में जाकर ऐसे समझदार बन जाते हैं मानो माँ के पेट से समझदारी की घुट्टी पीकर दुनिया में अवतरित हुए हों 7 किसीको एकाध बार ज़ुर्माना भरना पड़ जाए —नानी-दादी सब याद आ जाएं 7 तो भैया ! जब दूसरे देश में जाकर हम फाफड़ा यानि सीधे-सादे बनकर रह सकते हैं तो अपने देश में जलेबी बनकर रहना ज़रूरी है ?
सोचें,कोई जल्दी नहीं है ,
वैसे हम फिर मिलेंगे आपसे
हम भी कुछ कम नहीं हैं ?????
सो भइया ! छोटों को दुलार ,बड़ों को प्रणाम —
सत श्रीअकाल,सलाम,राम-राम —–
सस्नेह
डॉ. प्रणव भारती

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