August 20, 2019
Art-n-Culture

ज़िंदगी

ज़िंदगी कोई ढोल नहीं है
न ही कोई मंझीरा
न कोई ज़िद ,न फ़रमान
टूटा तारा भी नहीं
इतनी बेसहारा भी नहीं
खोखले आदर्शों का पिटारा
लड़खड़ाती साँसों का खटारा
खाली बोतल की आवाज़
न है इसमें कोई राज़
ज़िंदगी है एक डोर
साँझ हो या भोर
कसती है कभी
छोड़ देती है कभी
कूद पड़ो मझधार में
मारो हाथ-पेअर
अपना युद्ध स्वयं लड़ना होगा
कभी डूबना ,कभी उतरना होगा
फ़ितरत है ज़िंदगी की
फ़लसफ़ा मत ढूँढो
बस ,चलते चलो
चलते चलो,चलते चलो

डॉ. प्रणव भारती

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