September 23, 2019
Education

अदालतों की बुनियादी व्यवस्थाओं की खामियों का खुलासा हुआ

विधि सेंटर फॉर लीगल पालिसी की रिपोर्ट में भारत की जिला अदालतों की

बुनियादी व्यवस्थाओं की खामियों का खुलासा हुआ

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  इसे ट्वीट किया : सामान स्कैन करने की सुविधा नदारद, कोर्टरूम की कमी, पूर्ण सुसज्जित प्रसाधन कक्ष नहीं विधि सेंटर फॉर लीगल पालिसी के अनुसार ऐसी है भारतीय जिला अदालतों की दुर्दशा

●       अध्ययन के दौरान 665 जिला अदालत परिसरों का सर्वेक्षण और 6650 वादी-प्रतिवादियों से बातचीत

●       दिल्ली (90%), केरल (84%), मेघालय (75%), हरियाणा (70%) और हिमाचल प्रदेश (70%) राज्यों में सर्वश्रेष्ठ कामकाज होता है, वहीं बिहार (26%) और मणिपुर (29%) में हालात सबसे बुरे

●       सर्वेक्षण में शामिल केवल 11% अदालत परिसरों में सामानों की स्कैनिंग की सुविधा है, जबकि 71% में अग्निशामक और 48% में आपात निकास संकेत उपलब्ध हैं

●       केवल 40% अदालती परिसरों में पूर्ण सुसज्जित प्रसाधन कक्ष है. गोवा, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश और मिजोरम में उन  पूर्ण अदालतों की संख्या सबसे कम है जहां सुसज्जित प्रसाधन कक्ष उपलब्ध हैं. देश भर में 100 जिला अदालत भवन ऐसे हैं जहां महिला प्रसाधन कक्ष साफ़ नदारद है

●       केवल 39% राज्य ऐसे हैं जहां के अदालत परिसरों में में कैंटीन, बैंक शाखा, फोटोकॉपी, टाइपिस्ट, नोटरी, आदि जैसी सभी सेवाएं उपलब्ध हैं. जो सुविधा सबसे कम जगहों पर है, उनमें प्राथमिक उपचार सेवा (59%), डाकघर (63%) और बैंक शाखा (65%) सम्मिलित हैं

●       अनेक जिला अदालतों की वेबसाइट या तो निष्क्रिय हैं या काम करने के लायक नहीं हैं

नई दिल्ली, 1 अगस्त 2019 : अग्रणी और निष्पक्ष लीगल थिंक टैंक, विधि सेंटर फॉर लीगल पालिसी ने आज अपनी ताजा रिपोर्ट को सार्वजनिक किया. बिल्डिंग बेटर कोर्ट्स (सर्वेइंग द इंफ्रास्ट्रक्चर ऑफ़ इंडियाज डिस्ट्रिक्ट कोर्ट्स) नामक यह रिपोर्ट टाटा ट्रस्ट्स के सहयोग से तैयार की गयी है. रिपोर्ट में विभिन्न जिला अदालतों में उपलब्ध सुविधाओं में अंतर का विश्लेषण करते हुए इनकी हालत सुधारने और भारत में वादी-प्रतिवादियों के लिए न्याय की सामान्य सुलभता से जुडी मुख्य अनुशंसाओं का खुलासा किया गया है.

रिपोर्ट के बारे में विधि सेंटर फॉर लीगल पालिसी की रिसर्च फेलो और रिपोर्ट की सह-लेखिका, सुश्री रेशमा शेखर ने कहा कि, “न्यायिक सुधार के सवाल पर सार्वजनिक चर्चाएँ ज्यादातर लंबित मुकदमों, खाली पड़े न्यायिक पदों तक सीमित रह जातीं हैं, जबकि अदालतों की मूलभूत भौतिक सुविधाओं की हालत जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे उपेक्षित रह जाते हैं. अगर अदालत की बुनियादी सुविधाओं की चर्चा कभी होती भी है तो इसका स्वरुप अधिकांशतः मात्रात्मक यानी अदालती कक्षों और अदालत परिसरों की संख्या से ही जुड़ा होता है, उनकी गुणवत्ता से नहीं. इस रिपोर्ट में वादी-प्रतिवादी की नजर से अदालत के स्थानों का मूल्यांकन किया गया है और यह भारत की अदालतों में उपलब्ध गुणवत्ता का एक नायाब अध्ययन है.”

सर्वेक्षण मुख्य रूप से अदालत की मूलभूत सुविधाओं के भौतिक एवं डिजिटल पहलुओं पर केन्द्रित है और इसमें 665 जिला अदालतों का गुणात्मक आंकलन किया गया है और 6650 वादी-प्रतिवादियों के साक्षात्कार लिए गए हैं. सर्वेक्षण का उद्देश्य अदालती स्थानों के अभिगम हेतु सार्वजनिक परिवहन की सुलभता, अदालत परिसर में अलग-अलग स्थानों को खोजने में आसानी, प्रतीक्षालय, सफाई, सुरक्षा, सुविधायें आदि जैसे अनेक मानदंडों पर यूजर के अनुभव के बारे में पता लगाना था. सर्वेक्षण के बाद जो आंकड़ें उभर कर आये हैं, वे दुखद हैं.

रिपोर्ट के कुछ प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार हैं –

  1. लोकेशन के मामले में जिला अदालतों तक पहुंच 100% नहीं है : नैशनल कोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम्स (एनसीएमएस) की रिपोर्ट में अनुशंसा की गयी है कि अदालत परिसरों को ऐसी जगह होना चाहिए जहां सार्वजनिक परिवहन से पहुंचना आसान हो और पार्किंग की पर्याप्त सुविधा उपलब्ध हो. 539 अदालत परिसरों में से केवल 81% में सार्वजनिक परिवहन के सहारे पहुंचा जा सकता है, जबकि 532 परिसरों यानी 80% में निर्दिष्ट पार्किंग एरिया उपलब्ध हैं.
  2. अदालत परिसर में वादी-प्रतिवादियों के लिए रास्ता समझना एक बड़ी समस्या है : अदालती परिसरों में बहुत ही कम वादी-प्रतिवादी खुद ही रास्ता का पता लगा पाते हैं और अधिकाँश लोगों को वकीलों से पूछना पड़ता है. केवल 20% जिला अदालतों में गाइड मैप और 45% में हेल्पडेस्क मौजूद हैं.
  3. निर्दिष्ट प्रतीक्षालय : वादी-प्रतिवादियों और जनसाधारण के लिए केवल 54% जिला अदालत परिसरों में प्रतीक के लिए स्थान निर्दिष्ट है.
  4. वादी-प्रतिवादियों, आगंतुकों और वकीलों के लिए अलग-अलग और लैंगिक आधार पर पृथक सुव्यवस्थित टॉयलेट : यह एक पूर्व-अपेक्षित सुविधा है, किन्तु वेकल 80% अदालती परिसरों में ही प्रसाधन कक्ष (वाशरूम) है और उनमें से भी केवल 40% पूरी तरह उपयोग के लायक हैं. लगभग 100 जिला अदालतों में महिलाओं के लिए प्रसाधन कक्ष बिलकुल नहीं है.
  5. अदालतों के परिसर तक आसान पहुंच होनी चाहिए और इसकी बनावट सार्वजनिक एवं सुविधाजनक होनी चाहिए : किन्तु केवल 27% अदालत भवनों में रैंप और/या लिफ्ट है. केवल 11% परिसरों में ही दिव्यांग व्यक्तियों के लिए निर्दिष्ट वाशरूम है, और बिल्ट-इन विजुअल एड की सुविधा केवल 2% अदालतों में है.
  6. केवल 39% राज्यों में सम्पूर्ण सेवा वाले अदालत परिसर हैं : बैंक शाखा (65%), डाकघर (63%), प्राथमिक उपचार सेवा (59%) जैसी सुविधायें सबसे कम जगहों पर हैं, जबकि फोटोकॉपीअर (100%), टाइपिस्ट (98%) और स्टाम्प विक्रेता (97%) की सुविधा अधिकतर जगहों पर उपलब्ध है.
  7. न्यायाधीशों, प्रशासनिक कर्मचारियों, वकीलों, वादी-प्रतिवादियों, गवाहों, कैदियों और विचाराधीन आरोपितों की सुरक्षा अत्‍यधिक महत्‍वपूर्ण होनी चाहिए : यह अति महत्वपूर्ण पहलू है. लेकिन सामान की स्कैनिंग की व्यवस्था केवल 11% अदालत परिसरों में है, जबकि अग्निशामक 71% परिसरों में और आपातकालीन निकास के संकेत 48% परिसरों में उपलब्ध हैं.

विधि सेंटर फॉर लीगल पालिसी के विषय में

विधि सेंटर फॉर लीगल पालिसी (‘विधि’) एक स्वतंत्र वैचारिक संगठन है. यह सार्वजनिक हित में बेहतर क़ानून बनाने और शासन-संचालन में सुधार के लिए विधिक अनुसंधान करता है. विधि नीति-निर्धारण सबंधी जानकारी देने और नीति को क़ानून में बदलने के लिए भारत सरकार, राज्य सरकारों, न्यायिक एवं अन्य लोक संस्थानों के साथ काम करता है. विधि मौलिक विधिक अनुसंधान करता है, अदालतों में महत्वपूर्ण क़ानून एवं नीतिगत मुद्दों पर याचिका दायर करता है. इसके अलावा यह संगठन शासन-संचालन पर सकारात्मक प्रभाव पैदा करने के लिए नागरिक समितियों, शैक्षणिक संस्थानों तथा अन्य हितधारकों के साथ सहयोग करता है.

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