December 16, 2019
Art-n-Culture

मंटो मेरी नजर से।

अगर आपको मेरी कहानियां गंदी लगती हैं या अश्लील लगती है, तो इसमें मेरी कोई गलती नहीं है क्योंकि आप ही गंदे और अश्लील समाज में रहते हैं, मेरी कहानियां तो समाज को आइना दिखाने का काम करती है, मंटो ऐसा अक्सर कहा करता था।

मंटो न तो हिंदुस्तान का अफसाना निगार था न पाकिस्तान का अफसाना निगार, और ना ही एशिया महाद्वीप का। बल्कि मंटो तो एक ख्याति प्राप्त कहानीकार था।

मंटो जिसका पूरा नाम सआदत हसन मंटो था, का जन्म 11 मई सन 1912 को पंजाब के एक छोटे से गांव समराला में हुआ था।

मंटो ने लघु कथाओं के अलावा रेडियो ड्रामा और फिल्मों की कहानियां भी लिखीं। मंटो एक बहुत अच्छा सहाफी यानी पत्रकार भी था।

वह उर्दू का वाहिद ऐसा लेखक था कि जिसको जितना पसंद किया जाता था उतना ही नापसंद किया जाता था, हां ये बात और है कि मंटो को वही लोग सबसे ज्यादा पढ़ते थे जो मंटो को सबसे ज्यादा गालियां दिया करते थे।

इसी कारण मंटो को 6 बार अदालत भी जाना पड़ा, तीन बार हिंदुस्तान पाकिस्तान बंटवारे से पहले और तीन बार पाकिस्तान के बनने के बाद। फिर बात अलग है कि जिन लोगों ने उस पर मुकदमा दर्ज किया उन लोगों को कोई फायदा नहीं हुआ।

मंटो ने अपनी छोटी सी जिंदगी में भरपूर लेखनी चलायी उन्होंने 22 लघुकथा संग्रह, 1 उपन्यास, पांच रेडियो ड्रामा संग्रह, रचनाओं के तीन संग्रह तथा व्यक्तिगत रेखाचित्रों के दो संग्रह की रचना की।

मेरी नजर में मंटो एक ऐसा अलमस्त अफसाना निगार था कि वो जो देखता था वही कागज पर उतार देता था, उसने उस वक्त में भी समाज के उन चीजों के बारे में बात की जिसे हम आज के वक्त में भी बंद दरवाजों के पीछे किया करते हैं, मंटो ने समाज के ऐसे तबके के बारे में बताया जो हमारे आस पास तो है लेकिन हम उन लोगों के बारे में बात करने से हिचकिचाते हैं।

मंटो को मैं बड़ा अफसाना निगार या बड़ा इंसान इसलिए कहता हूं क्योंकि मंटो आवाम का अफसाना निगार था, मंटो ने हर उस चीज के ख़िलाफ़ लिखा और बोला जो मंटो को गलत लगा, चाहे मंटो कितनी भी गरीबी में रहा हो चाहे उसने अच्छे दिन देखे हों लेकिन कभी भी वह अपने उसूलों से हटा नहीं, इसीलिए वो अपने आप ने महान शख्सियत था।

मंटो मेरी जानकारी में ऐसा लेखक है कि वह जिस जुबान में लिखता था उसी जुबान में कहते हैं 3 बार फेल हुआ, कुछ लोग कहते हैं कि मंटो सिगरेट और शराब बहुत पीता था , मंटो को सिगरेट और शराब की लत इस हद तक लग गई थी कि अगर मंटो को यह ना मिले तो मंटो पागलों जैसा बर्ताव करने लगता था,।

मंटो की कुछ मशहूर कहानियां इस प्रकार है, खोल्डो, ठंडा गोश्त, टोबा टेक सिंह, काली सलवार इत्यादि।

मंटो के अफसाने की एक खास बात यह भी है कि जब आप उस की कहानियां सुनेंगे तो आपको बिल्कुल भी नहीं लगेगा कि आप उसकी कहानियां सुन रहे हैं, बल्कि आपको लगेगा कि आप बंद आंखों से वही होते हुए देख रहे हैं जो मंटो ने अपने अफसानों में कहा है।, उस वक्त के लोग बताते हैं कि मंटो बहुत जिंदादिल, मिलनसार और मजाकिया इंसान था।

मंटो ने 22 साल की उम्र में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया जहां अली सरदार जाफरी जैसे मशहूर शायर की संगत मिली, लेकिन ज्यादा दिन तक अलीगढ़ नहीं रह पाए, वापस अमृतसर आ गए, फिर वहां से लाहौर चले गए, जहां मंटो ने पारस नाम के एक अखबार में नौकरी कर ली, और मुसवविर नाम के एक अखबार का संपादन करने लग गए, फिर मंटू 1939 में दिल्ली आ गए, दिल्ली में सिर्फ 17 महीने ही रहे दिल्ली में ही आकर उन्होंने रेडियो नाटक लिखें साथ ही ऑल इंडिया रेडियो में भी काम करते रहे किन्तु 1942 में मुंबई आ गए, जहां उनको कमाल अमरोही अशोक कुमार वाचा और कृष्ण चन्द्र जैसे लोगों की की संगत मिली।मुंबई में ही आकर उन्होंने फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखी और काफी शोहरत कमाई, लेकिन फिर 1948 में मंटो को लाहौर जाना पड़ा।
लाहौर में अदब और साहित्य का माहौल नहीं था, तो मंटो काफी तन्हा हो गए और शराब में और ज्यादा डूबने लगे, इसी कारण 1955 में किडनी खराब होने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।
लेकिन सहादत हसन मंटो हम सबके दिलों में आज भी जिंदा हैं।
©राजीव साहिर।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *