January 18, 2020
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New Delhi, 15th January 2020: Art Magnum presents Magnetic Abstractions, a solo exhibition by artist Manisha Gawade. Magnetic Abstractions is truly reflective of Manisha’s soul as an artist. The works speak volumes about her journeys and experiences both as an artist and as a traveller. A combination of minimalistic abstractions and breathtaking cityscapes draw the viewers through its magnetic and sometimes minimalistic depiction of various cities and journeys to some of India’s rich cultural moorings. Some of the cityscapes in the show include Delhi, Mumbai, Banaras, Mysore, Udaipur and Dubai where Manisha spend a large part of her life.

The evening was presented at Gallery Art Magnum, 6C/4, Indian Oil Complex, Sri Aurobindo Marg, Yusuf Sarai, New Delhi 110016.

The show was inaugurated by H.E. Coromoto Godoy Calderon, Ambassador of Venezuela, Alonso Herrera de Abreu, Minister Counselor & Artist Prof Niren Sengupta and continued till 15th February, 2020 at Gallery Art Magnum, 6C/4, Indian Oil Complex, Sri Aurobindo Marg, Yusuf Sarai, New Delhi 110016 from 11 am to 7 pm.

The guests spotted at the event were Rashmi Vaidialingam, Alka Raghuvanshi, Sangeeta Gupta, Ex. IRS, Sei Ram Gohri, Artist Prof Niren Sengupta, Asit Kumar Patnaik & Kumar Vikas Saxena, Artist Praveen Upadhye & Artist Vilas Kulkarni, Nupur Sakhuja Kundu & Niladri Paul, Faiyaz Wasifuddin Dagar, Indian classical singer, Nrityashri Alaknanda to name a few.

On the occasion, Manisha said ” Magnetic Abstractions is a combination of semi abstract cityscapes and abstract paintings. The works in this show span over 5 long years of my work. The journey has been long and times taking. A lot of soul searching has gone in into the creation of all the works at the exhibition. After experimenting and heavy research and development I created the range of art furniture which has the capacity to energise any living space where it is used.

The finishes and designs are sturdy enough to be passed on to the next generation. Through the series Aapaar Niraakaar I have tried to show that God has no specific form and as INDIAN we have prayed to him through the elements in any form be it a river, a Stone, a tree and so on. Every religion is just another path of reaching the same higher power. God’s justice and mercy has no form he finds us in the toughest of times to bless us. Hence the series Aapaar Niraakaar.

The cityscapes for me are closest to my heart and the imagery is more impressionistic than realistic I have just tried to capture the feeling of the place more than physical attributes alone.I have tried to capture the vibrant colours of Holi festival played by lord Krishna in the series Krishna Vatika.Many textures have been created on various surfaces such as canvas, wood, P.v.c, textile in the interest of the end user. I am very sure that the show will make a wonderful collection at affordable prices for any one interested in art.”

On the occasion, Saurabh said “Art magnum is proud to present the solo show of Manisha Gawade. The exhibition showcases her full potential as an artist. It highlights her journey over the years and more importantly showcases her evolution from an upcoming artist to a senior artist. The exhibition took 4 months of planning and new works were specially commissioned for this exhibition which has added freshness and vibrancy to the entire collection.”

भद्रवाह (जम्मू-कश्मीर)। बर्फबारी और शीत लहर की चपेट में कश्मीर के इलाके  बेशक कटे हुए हों। लेकिन कश्मीर के भद्रवाह इलाके में इन दिनों कल्चरल फेसिटवल मनाया जा रहा है। इस इलाके के लोगों ने इस कल्चरल फेस्टिवल में खूब जमकर अपने पारंपरिक नृत्य को किया। बर्फबारी के बावजूद इस कार्यक्रम में पहुंचे केंद्रीय संस्कृति मंत्री प्रह्लाद पटेल ने कार्यक्रम में कहा कि इस इलाके को सरकार टूरिज्म हब की तरह विकसित करने के लिए प्रयास जारी हैं।

सरकार यहां महिलाओं को टूरिस्ट गाइड की मुफ्त में ट्रेनिंग तो देगी ही साथ ही लोगों को होम स्टे के लिए फंड भी उपलब्ध कराएगी। पिछले कुछ दिनों से डोडा जिले के भद्रवाह शहर में विंटर कल्चरल फेस्टिवल चल रहा है। इसमें पूरे इलाके के स्कूल के बच्चों और लोगों ने भाग लिया। जम्मू-कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश बनाने के बाद जम्म-कश्मीर में अपनी तरह का ये पहला फेस्टिवल था। जिसमें शिरकत करने खुद केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री प्रह्लाद पटेल पहुंचे।

उन्होंने यहां एक पर्यटन केंद्र का उद्घाटन किया, साथ ही इलाके को टूरिस्ट हब बनाने की बात भी कही। उन्होंने अधिकारियों से इलाके में इको टूरिज्म भी विकसित करने के बारे में चर्चा की। पिछले पांच दिनों से चल रहे इस फेस्टिवल को स्मार्टसिटी फाउंडेशन ने आयोजित किया था। इस कार्यक्रम में पूरे इलाके करीब 500 छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया।

Nasik :  Saptashringi ( सप्तश्रृंगी, Saptaśrr̥ṇgī)Temple is a site of Hindu pilgrimage situated 72 kilo meter from Nashik . According to Hindu traditions, the goddess Saptashrungi Nivasini dwells within the seven mountain peaks. (Sapta means seven and shrung means peaks.) It is located in Nanduri, Kalwan taluka, a small village near Nashik .

The Marathas and some Bhil tribes worship the goddess from a long time and some worship as their kuldaivat. There are 510 steps to climb the gad. Devotees visit this place in large numbers every day.The temple is also known popularly as one of the “three and half Shakti Peethas” of Maharashtra.

The temple is also one among the 51 Shakti Peethas located on the Indian subcontinent and is a location where one of Sati’s (wife of Lord Shiva) limbs, her right arm is reported to have fallen. Its half shaktipeeth among three and half shaktipeeth of Maharashtra. Photo Girish Srivastav/ 24.12.2019

Rahul Bhuchar, Producer and MD, Felicity Theatre who is playing the eponymous role of Karn in the play Mahabharat which was essayed by Pankaj Dheer in the original TV serial Mahbaharat directed by B.R. Chopra and his son Ravi Chopra thirty one years ago and telecast on Doordarshan, says ‘Recreating Mahabharata with some of the finest talents from cinema and television has truly been a fascinating journey.

हर एक बात पे कहते हो तुम के तू क्या है।
तुम ही कहो के ये अंदाज ए गुफ्तगू क्या है।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल।
जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।
बना है शाह का मुसाहिब फिर ए है इतराता।
वगरना शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है।

मिर्ज़ा गालिब के जिसका पूरा नाम मिर्ज़ा असदुल्ला खान गालिब था, का जन्म 27 दिसंबर सन 1797 में हुआ, गालिब आगरा में पैदा हुए और उनकी शुरुआती शिक्षा दीक्षा भी आगरा में ही हुई, आपके पिताजी रियासत अलवर के बादशाह बख्तावर सिंह के यहां मुलाजिम थे, मगर गालिब की पैदाइश के कुछ सालों बाद ही इनके पिताजी खाना जंगी का शिकार हुए और गोली लगने पर उनका इंतकाल हो गया, उसके बाद इनकी देखरेख इनके चाचा नसरुल्ला बेग ने की जो आगरा में मराठों की तरफ से सूबेदार मुकर्रर किए गए थे, और फिर आगरा पर अंग्रेजों के कब्जे के बाद वहां के कमिश्नर मुकर्रर कर दिए गए, लेकिन जब गालिब सिर्फ 9 साल के थे तभी इनके चाचा का इंतकाल हाथी के ऊपर से गिरने से हो गया।

गालिब ने जब होश संभाला तो मुगलिया सल्तनत का सूरज डूबा जाता था, और मुगलों के आखिरी नवाब बहादुर शाह जफर की इज्जत सिर्फ उनके किले तक ही महदूद रह गई थी, इसके उलट उर्दू अदब और उर्दू शायरी अपने पूरे परवान पर थी, लेकिन शायद बहुत कम लोगों को ये मालूम होगा कि गालिब ने अपनी शायरी की शुरुआत फारसी ज़बान से की। उर्दू में कुछ वक्त बाद लिखना शुरू किया उनकी एक बड़ी मशहूर ग़ज़ल है जो मुझे काफी पसंद है।

नक्श फरियादी है किसकी शोखिए तहरीर का।
कागजी है पैरहन हर पैक अरे तस्वीर का।
जज़्बाए बे इख्तियार ए शौख देखा चाहिए।
सीन आए शमशीर से बाहर है दम शमशीर का।
बस के गालिब हूं असीर ई में भी आतिश जेरे पा।
मुए आतिश दीदा है हल्का मेरी ज़ंजीर का।

गालिब ने फारसी की तालीम और शतरंज की तालीम मौलवी मुआजम से और उर्दू की तालीम मौलाना अब्दुल बारी साहब से लि।
आप 11 साल तक अपने ननिहाल में रहे जो कि आगरा ही में था फिर उसके बाद आप दिल्ली के चांदनी चौक के पास बल्लीमारान के कासिम जान गली में आए और वहीं रहने लग गए, जहां गालिब की हवेली आज भी वैसी ही है, मैं दो बार गालिब की हवेली जा चुका हूं और जब मैं गया और जब मैं वहां से वापस आया तो मुझे मिर्ज़ा गालिब का एक शेर याद आता है बार-बार।।

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले।
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए थे लेकिन।
बहुत बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।

मुझे मिर्ज़ा के ये शेर इसलिए याद आते हैं क्योंकि उनकी हवेली की ऐसी हालत देखकर कलेजा छलनी छलनी हो जाता है, मैं जब उनकी हवेली में पहली बार गया तो मुझे जाने के बाद ऐसा बिल्कुल नहीं लगा कि आज से डेढ़ सौ साल पहले उर्दू अदब का भगवान रहा करता होगा वहां।
गालिब को जितनी शोहरत हासिल आज है उतनी उनके जीते जी नहीं थी, उन्होंने काफी मुफलिसी का सामना किया लेकिन इसके बावजूद भी उनकी शायरी पर कोई रुकावट नहीं आई उल्टे उनकी शायरी में और निखार आता रहा।

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे।
कहते हैं कि गालिब का है अंदाज ए बयां और।

सही में गालिब का अंदाज सबसे निराला और ग़ालिब वाहिद एक ऐसा शायर था जो अपने जमाने में मशहूर ना होने के बावजूद भी महबूब शायर था, और आज ग़ालिब मशहूर भी हैं और महबूब भी।
एक बहुत बड़े उर्दू के जानकार प्रोफेसर गोपीचंद नारंग गालिब के बारे में कहते हैं कि मुगलों ने हिंदुस्तान को तीन बहुत नायाब तौहफे दिए, पहला ताजमहल, दूसरा उर्दू ज़ुबान, और तीसरे मिर्ज़ा गालिब,।
मुझे भी ऐसा ही लगता है कि अगर ग़ालिब ना होते तो उर्दू ज़बान उर्दू शायरी उर्दू अदब और उर्दू कल्चर का हुस्न अधूरा ही रहता, मेरी नजर में गालिब एक ऐसे शायर हैं कि जिनको आप पसंद और नापसंद तो कर सकते हैं, लेकिन आप उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते।

इब्ने मरियम हुआ करे कोई।
मेरे दुख की दवा करे कोई।
बक रहा हूं जुनू में क्या क्या मैं।
कुछ ना समझे खुदा करें कोई।

मैंने अपने बड़े बुजुर्गों से नवाब जान के बारे में भी सुना है जो दिल्ली की मशहूर तवायफ थी और गालिब पर अपना दिल हार बैठी थी, और शायद गालिब भी उनसे इश्क करने लग गए थे,, कहते हैं कि नवाब जान जब गालिब की ग़ज़लें गाती थी तो उनके कोठे की रौनक देखते बनती थी, लेकिन जमाने वालों ने किसके इश्क को सर माथे लिया है, कहने वालों ने तो मीराबाई तक को कृष्ण की रखैल कह दिया, तो नवाब जान को भी परेशानियों का सामना करना पड़ा और इसी वजह से उन्हें दिल्ली छोड़कर बनारस की तरफ कूच करना पड़ा, कहते हैं कि गालिब जब अपने पेंशन के सिलसिले में कोलकाता जा रहे थे तो उनका बनारस भी रुकना हुआ और फिर नवाब जान के घर भी गए, लेकिन वहां जाकर उन्हें मालूम चला कि अब उनकी माशूका नहीं रहीं उनका इंतकाल हो गया।

ये ना थी हमारी किस्मत के विसाले यार होता।
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।

गालिब नवाब जान की मौत के बाद काफी टूट गए थे, और कुदरत का करिश्मा तो देखिए कि जिस पेंशन के सिलसिले में गए वो काम भी नहीं हो पाया, और फिर जब गालिब दिल्ली आए तो मानो जैसे उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, उनका एक ही बेटा जो कुछ महीनों का था वो मर चुका था, इससे भी गालिब को काफी धक्का लगा।
आगे चलकर गालिब को शराब और जुए की बहुत ज्यादा लत लग चुकी थी, एक बड़ा मशहूर किस्सा है, उनसे एक बार किसी ने पूछा कि मिर्ज़ा तुम इतनी शराब क्यों पीते हो, तो उन्होंने पलटकर कहा, देखो मियां खुदा ने सबके खाने का इंतजाम किया है तो पीने का इंतजाम मैं खुद ही कर लेता हूं।

ये मसाले तसव्वुफ ये तेरा बयान गालिब।
तुझे हम वली समझते जो ना बादाखार होता

कहा जाता है कि गालिब नास्तिक थे लेकिन गालिब ने एक शेर कहा है जो सुनकर मुझे नहीं लगता कि ग़ालिब नास्तिक थे।

बनाकर फकीरों का हम भेस गालिब।
तमाशा ए एहले करम देखते हैं।

गालिब मेरी नजर में एक सूफी संत थे, जो आज भी अपनी शायरी और अपनी लेखनी के जरिए जिंदा हैं, मेरा मानना है कि जिनकी शायरी जिंदा होती है वह कभी मरा नहीं करते शब्दों के जरिए हमेशा हमेशा के लिए जिंदा रह जाते हैं, और गालिब उन शायरों में शुमार होते हैं जो शायद कयामत के बाद भी पढ़े जाएं।

गालिब ने हर उस मौजू को छूने की कोशिश की जो एक आम इंसान सोचता है, इसीलिए गालिब सबसे मुश्किल शायर होने के बावजूद भी आवाम के शायर रहे।
गालिब ने अपनी सारी जिंदगी सिर्फ लिखने का ही काम किया, उन्होंने उर्दू और फारसी ज़बान की जितनी खिदमत की मुझे नहीं लगता किसी और ने की होगी, दीवान ए ग़ालिब नाम से उनका मशहूर ग़ज़ल संग्रह जो आज भी बहुत पढ़ा जाने वाला किताब है, इसके अलावा उन्होंने खत लिखें जो बहुत मशहूर हैं, नज़्में बच्चों के लिए कायदा और बहुत कुछ लिखा।

गालिब से मेरी मुलाकात गुलजार साहब के जरिए हुई, मेरी 12वीं के इंतिहान थे और पढ़ाई में मन नहीं लग रहा था तो सोचा कि थोड़ी तफरी की जाए, उसी वक्त मैंने गुलजार साहब का बनाया हुआ नाटक, मिर्ज़ा ग़ालिब देखा, फिर तो गालिब का जैसे मैं दीवाना सा हो गया।

गालिब ने शायरी के अलावा मुगल सल्तनत के आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफर की और उनके खानदान की तारीख भी लिखी, मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है कि मुगलों के पतन की कहानी गालिब से अच्छा कोई नहीं लिख सकता था।

गालिब ने अपने आखिरी दिन बल्लीमारान के कासिम जान गली वाली हवेली में ही बिताई, यहीं पर रहकर आपने 1857 का खौफनाक मंजर देखा, और यही रहते हुए आपको मालूम चला कि बहादुर शाह जफर को रंगून भेज दिया गया है, और उनके बेटों का सर काटकर खूनी दरवाजे पर लटका दिया गया है, और अब दिल्ली पर भी अंग्रेजों का कब्जा हो गया है।

गालिब इसके 12 साल बाद यानी अट्ठारह सौ 69 को पर्दा कर गए, लेकिन खुदा की मर्जी तो देखिए ग़ालिब साहब के मरने के बाद उन्हें दफनाया भी गया तो हजरत निजामुद्दीन औलिया साहब की मजार के पीछे, लेकिन दुख तब होता है जब मालूम चलता है की उर्दू अदब के भगवान गालिब के मजार की देखरेख करने वाला आज कोई नहीं है।

दर्द मिन्नत कश ए दवा ना हुआ।
मैं ना अच्छा हुआ बुरा ना हुआ।
कुछ तो पढ़िए के लोग कहते हैं।
आज गालिब ग़ज़ल सरा ना हुआ।

©राजीव साहिर।