September 21, 2020
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राजभाषा निदेशक आर. रमेश आर्य एवं प्रख्यात साहित्यकार सुरेश ऋतुपर्ण थे सम्मानित अतिथि
भाषा अस्मिता की संवाहक होती है – सुरेश ऋतुपर्ण भारतीय संस्कृति का समन्वय-सूत्र है हिंदी – आर. रमेश आर्य

नई दिल्ली। 18 सितंबर 2020; राजभाषा हिंदी सप्ताह के समापन के अवसर पर आज साहित्य अकादेमी मंे समापन समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें प्रख्यात साहित्यकार सुरेश ऋतुपर्ण मुख्य अतिथि के रूप में तथा आर. रमेश आर्य, राजभाषा निदेशक, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थिति थे। कार्यक्रम के प्रारंभ में साहित्य अकादेमी के सचिव एवं अध्यक्ष राजभाषा कार्यान्वयन समिति के. श्रीनिवासराव ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि साहित्य अकादेमी राजभाषा विभाग द्वारा निर्देशित सभी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सदैव तत्पर रहती है। उन्होंने अकादेमी के उपस्थित कर्मचारियों से अनुरोध किया कि वे भी राजभाषा विभाग द्वारा निर्धारित लक्ष्यों को पाने के लिए सहयोग करें। 

समापन समारोह में अकादेमी की राजभाषा पत्रिका आलोक के नए अंक का लोकार्पण किया गया। राजभाषा हिंदी सप्ताह के दौरान आयोजित अनुवाद प्रतियोगिता, निबंध प्रतियोगिता, यूनिकोड टंकण प्रतियोगिता एवं श्रुत लेखन प्रतियोगिता के विजेता प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया गया। कार्यक्रम के अंत में अपना वक्तव्य देते हुए आर. रमेश आर्य ने कहा कि हिंदी सामाजिक संस्कृति को विकसित करने वाली भाषा है और हमें अपनी मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषा के साथ ही राष्ट्रभाषा हिंदी को भी भारतीय संस्कृति के समन्वय सूत्र के रूप में सम्मान देना चाहिए और उसका अपने दैनिक कार्यों में अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए। सुरेश ऋतुपर्ण ने भाषा को अस्मिता से जोड़ते हुए कहा कि भाषा हमारे राष्ट्र का गौरव ही नहीं बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर की भी संवाहक होती है। उन्होंने माॅरीशस, फीजी, जापान, ट्रिनिनाड एवं टुबेको के अपने प्रवास की घटनाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि भाषा अपने साथ संस्कृति भी ले जाती है और वहाँ के परिवेश में हमारी जडं़े जमाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

उन्होंने रोजमर्रा के जीवन में मातृभाषाओं के कम होते प्रयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इस तरह हम अपनी भाषा ही नहीं बल्कि विराट संस्कृति की भी उपेक्षा कर रहे हैं, जो उचित नहीं है।राजभाषा सप्ताह के दौरान पिछले 17 सितंबर 2020 को गीतकार एवं ग़ज़लकार हरेराम समीप, विज्ञान व्रत, कमलेश भट्ट कमल एवं बी.एल. गौड़ ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत की थीं। राजभाषा सप्ताह का शुभारंभ प्रख्यात लेखिका मृदुला गर्ग ने 14 सितंबर 2020 को विधिवत् उद्घाटन करके किया था।

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जीवन को संगीत और संगीत को जीवन मानने वाले पंडित जसराज एक कार्यक्रम के सिलसिले में इंदौर आए हैं। उन्होंने अपने बारे में खुलकर बात की।उन्होंने बताया कि “कृष्णजी को गाता हूं मैं। उनकी भक्ति ही सारा संगीत है मेरा। बिरले ही सही लेकिन जब गाता हूं तो कभी वह क्षण भी आता है जब कृष्ण दर्शन देते हैं। मुझे उनका अलौकिक रूप नज़र आता है।

यह सिर्फ तब होता है जब एक सुर सधा हुआ लग जाए, अच्छा लग जाए… ऐसा हो तो ही मिलती है वह छवि। प्रभु दिखें ऐसे सुर कब लगते हैं जानते हो! जब मैं और आनंद एक हो जाते हैं। जब किसी भी दायरे से परे हो जाता है गाना। वही तो आनंद है और जब तब आनंद तब तक राग, नहीं तो बैराग। लोग कहते हैं संगीत जीवन देता है, मेरा कहना है कि संगीत तो खुद ही जीवित शय है… और जो जीवित है वह बदलता रहेगा…उसमें छिपे भाव बदलते रहेंगे।

जो बदल न सके वो तो मृत है। आज भी जब गाने बैठता हूं तो मन में उठने वाले भाव नए होते हैं…ताज़ा होते हैं।

शुरुआती दौर में मैं 20 घंटे रियाज़

अक्सर यह बात सामने आती है कि संगीत बदल रहा है। असल में लोग शास्त्रीय संगीत समझते नहीं हैं। जो शास्त्रीय संगीत सीखते हैं वे ही उसे बेहतर समझ पाते हैं। संगीत के सच्चे साधक को रियाज़ के अलावा कुछ और नहीं सोचना चाहिए। मेरा रियाज़ तो चाहकर भी नहीं छूट सकता। शुरुआती दौर में मैं 20 घंटे रियाज़ किया करता था। आज दो-ढाई घंटे ही गाता हूं। इतनी ही देर सिखाता भी हूं…अंतर भी तो आ गया है समय में…पहले लोग 20-20 किलोमीटर दौड़ लिया करते थे। अब दो किमी भी दौड़ नहीं सकते।

क्रिकेट में मेरी रुचि है

संगीत से इतर मैं कुछ सोच नहीं सकता लेकिन क्रिकेट में मेरी रुचि है। 1986 से ही क्रिकेट का शौक है। उस समय रेडियो पर अक्सर लंदन से क्रिकेट कॉमेंट्री आती थी। सिग्नल साफ हो ना हो…आवाज़ आ रही हो या नहीं, लेकिन पूरे समय रेडियाे कान से लगाकर कॉमेंट्री सुनता था। भारत की टीम में सचिन और कुंबले यदि होते तो किसी में दम नहीं था कि 10-15 सालों तक हमें कोई हरा सकता था। क्रिकेट का ये शौक आज भी बरकरार है मेरा।

अपमान ने मोड़ा गाने की ओर

पंडित जसराज ने कहा कि संगीत की राह पर मेरी शुरुआत तबले से हुई थी। 14 बरस की उम्र में अपमानित करने वाली एक घटना ने मुझे गायकी की ओर मोड़ दिया। इंदौर का होलकर घराना काफी प्रसिद्ध रहा है। उस्ताद अमीर खां, पंडित कुमार गंधर्व, लता मंगेशकर, किशोर कुमार सहित इतनी हस्तियां यहां से हैं। कई बार लगता है कि कहां मैं हरियाणा में पैदा हो गया। ईश्वर इंदौर में ही जन्म दे देता तो इन सभी की सोहबत मिलती।

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मशहूर शास्‍त्रीय गायक पंडित जसराज का 90 साल की उम्र में अमेरिका के न्यू जर्सी में निधन हो गया है. पंडितजी शास्‍त्रीय संगीत के मेवाती घराने से ताल्‍लुक रखते थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पंडित जसराज के निधन पर शोक जताया है. जनवरी में अपना 90वां जन्मदिन मनाने वाले पंडित जसराज ने आखिरी प्रस्तुति नौ अप्रैल 2020 को हनुमान जयंती पर फेसबुक लाइव के जरिये वाराणसी के संकटमोचन हनुमान मंदिर के ल‍िए दी थी. 

पंडित जसराज के निधन की खबर देते हुए उनकी बेटी दुर्गा जसराज ने बताया कि बड़े दुख के साथ हमें यह सूचित करना पड़ रहा है कि संगीत मार्तंड पंडित जसराज ने अमेरिका के न्यू जर्सी में सुबह 5:15 बजे कार्डिएक अरेस्ट होने के चलते अंतिम सांस लीं. पंडित जसराज के निधन से संगीत जगत को बहुत बड़ी क्षति पहुंची है.

पीएम मोदी ने उनके निधन पर गहरा दुख जताया है. पीएम मोदी ने सोशल मीडिया साईट ट्विटर पर इस बारे में एक ट्वीट भी किया है. उन्होंने लिखा, “पंडित जसराज का निधन भारत के शास्त्रीय संगीत जगत के लिए बहुत बड़ी क्षति है. उन्होंने देश-दुनिया में बहुत से संगीतकारों को बढ़ावा दिया है, उनके परिवार के लिए मेरी संवेदनाएं.”उनके परिवार में उनकी पत्‍नी मधु जसराज, पुत्र सारंग देव और पुत्री दुर्गा जसराज हैं. खयाल गायकी और ठुमरी में पंडित जसराज को महारत हासिल थी.

पद्मभूषण सहित संगीत के क्षेत्र के कई सम्‍मान से उन्‍हें नवाजा गया था. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पंडित जसराज के निधन पर शोक व्यक्त किया है. उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “मशहूर संगीतज्ञ पंडित जसराज के निधन से मैं दुखी हूं.” पंडित जसराज के निधन पर लोक संगीत गायिका मालिनी अवस्थी ने दुख प्रकट करते हुए ट्विटर पर लिखा कि मूर्धन्य गायक, मेवाती घराने के गौरव पद्मविभूषण पंडित जसराज जी नही रहे. यह संगीत जगत की अपूरणीय क्षति है.

पंडित जसराज अपने जीवन काल में पद्म विभूषण, पद्म श्री संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, मारवाड़ संगीत रत्न पुरस्कार आदि कई सम्मान से नवाजे गए. पंडित जसराज का जन्म 28 जनवरी 1930 को एक शास्त्रीय संगीत परिवार में हुआ. उनके परिवार की 4 पीढ़ियों ने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक से बढ़कर एक शिल्पी दिया है. उनके पिताजी पंडित मोतीराम जी स्वयं मेवाती घराने के एक विशिष्ट संगीतज्ञ थे. 

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मैं मर जाऊँ तो मेरी इक अलग पहचान लिख देना,
लहू से मेरी पेशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना..!

“‘सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिटटी में किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है’ यह बेमिसाल शेर कहने वाले उर्दू के सुप्रसिद्ध शायर राहत इंदौरी का मंगलवार शाम 5:00 बजे निधन हो गया। राहत इंदौरी ने बीत दिन ही अपने कोरोना पॉजिटिव होने की खबर सोशल मीडिया के माध्यम से दी थी और लोगों से उनके अच्छे स्वास्थ्य की दुआ करने के लिए कहा था। लेकिन वह अपने सारे चाहने वालों का दिल तोड़ कर दुनिया को अलविदा कह गए। इंदौरी साहब रात साढ़े नौ बजे छोटी खजरानी (इंदौर) कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक कर दिए गए । कोविड प्रोटोकॉल का पालन करते हुए उनको दफनाया गया।राहत इंदौरी ने मंगलवार सुबह ही ट्विटर पर अपने कोरोना संक्रमित होने की जानकारी दी थी. मंगलवार को इसी एकाउंट से उनकी मृत्यु की सूचना दी गई.
राहत इंदौरी के मरणोपरांत उनके ट्विटर अकाउंट से ये ट्वीट किया गया.

इस ट्वीट में लिखा है – “राहत साहब का Cardiac Arrest की वजह से आज शाम 05:00 बजे इंतेक़ाल हो गया है….. उनकी मग़फ़िरत के लिए दुआ कीजिये।
उनके निधन पर राजनीति, फिल्म, साहित्य जगत की हस्तियों गहरा दुख प्रकट किया है.
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ट्वीटर पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा, “अपनी शायरी से लाखों-करोड़ों दिलों पर राज करने वाले मशहूर शायर, हरदिल अज़ीज़ श्री राहत इंदौरी का निधन मध्यप्रदेश और देश के लिए अपूरणीय क्षति है. मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि उनकी आत्मा को शांति दें और उनके परिजनों और चाहने वालों को इस अपार दुःख को सहने की शक्ति दें.रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने राहत इंदौरी के निधन पर ट्वीट करके लिखा, दुख की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके चाहने वालों के साथ हैं.

इसी साल उनके द्वारा एक मुशायरे में पढ़ी गयी अपनी नज़्म ‘बुलाती है मगर जाने का नहीं’ भी टिक टोक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर खासी वायरल हुई थी. आइए एक नजर डालते हैं राहत इंदौरी के उन फेमस शेर पर जिन्हें लोगों ने कई बार दोहराया।

-दो गज सही ये मेरी मिलकियत तो है
ऐ मौत तूने मुझे जमींदार कर दिया।

इबादतों की हिफाजत भी उनके जिम्मे हैं,
जो मस्जिदों में सफारी पहन के आते हैं।

-अफवाह थी की मेरी तबियत खराब है
लोगों ने पूछ-पूछ के बीमार कर दिया।

-अब कहां ढूढने जाओगे हमारे कातिल
आप तो तत्ल का इल्जाम हमीं पर रख दो।

Mahipal Singh chauhan

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नई दिल्ली: अयोध्या में ऐतिहासिक राम मंदिर के नीचे टाइम कैप्सूल (Time capsule) रखा जायेगा। इस बात के सामने आने के बाद से हर तरफ टाइम कैप्सूल की चर्चा होने लगी है। हर कोई इस डिवाइस के बारे में जानने को उत्सुक है कि आखिर यह होता क्या है और इसे लगाए जाने के पिछे क्या मकसद है।

टाइम कैप्सूल एक ऐसी डिवाइस होती है, जिसकी मदद से वर्तमान दुनिया से जुड़ी जानकारियों को भविष्य के लिए सुरक्षित किया जा सकता है।  इसे दबाने का मकसद किसी समाज, काल या देश के इतिहास को सुरक्षित रखना होता है। यह एक तरह से भविष्य के लोगों के साथ संवाद है। इससे भविष्य की पीढ़ी को किसी खास युग, समाज और देश के बारे में जानने में मदद मिलती है।

बर्गोस में मिला था 400 साल पुराना टाइम कैप्सूल

स्पेन के बर्गोस में 30 नवंबर, 2017 में करीब 400 साल पुराना टाइम कैप्सूल (Time capsule) मिला। यह यीशू मसीह के मूर्ति के रूप में था। मूर्ति के अंदर एक दस्तावेज था। इसमें 1777 के आसपास की आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सूचना थी। फिलहाल इसे ही सबसे पुराना टाइम कैप्सूल माना जा रहा है। इसके बाद फिलहाल ऐसा कोई टाइम कैप्सूल नहीं मिला है। वर्तमान समय में करीब 20 देशों ने विभिन्न स्थानों पर टाइम कैप्सूल को दबाया है।

भविष्य में जब कोई भी इतिहास देखना चाहेगा तो श्रीराम जन्मभूमि के संघर्ष के इतिहास के साथ यह तथ्य भी निकल कर आएगा। इससे कोई भी विवाद जन्म ही नहीं लेगा। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट ने एक न्यूज एजेंसी से बातचीत के दौरान इस तथ्य की पुष्टि की है और बताया कि राम मंदिर निर्माण स्थल पर जमीन में लगभग 200 फुट नीचे एक टाइम कैप्सूल रखा जाएगा।

टाइम कैप्सूल होता क्या है?

Time capsule एक कंटेनर की तरह होता है जिसे विशिष्ट सामग्री से बनाया जाता है। टाइम कैप्सूल हर तरह के मौसम का सामना करने में सक्षम होता है। इसे जमीन के अंदर काफी गहराई में दबाया है। काफी गहराई में होने के बावजूद भी हजारों साल तक न तो उसको कोई नुकसान पहुंचता है और न ही वह सड़ता-गलता है।

राम मंदिर निर्माण स्थल पर लगाया जाने वाला Time capsule को तांबे से बनाया जा रहा है और इसकी लंबाई करीब तीन फुट होगी। इस कॉपर की विशेषता यह है कि सैकड़ों हजारों साल बाद भी इसे जब जमीन से निकाला जाएगा तो इसमें मौजूद सभी दस्तावेज पूरी तरह से सुरक्षित होंगे।

इंदिरा गांधी ने रखा था पहला टाइम कैप्सूल

ऐसा नहीं है कि किसी जगह पर Time capsule पहली बार रखा जा रहा है। इससे पहले भी देश में  अलग-अलग जगहों पर टाइम कैप्सूल रखे जा चुके हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1972 में रेड फोर्ट कॉम्प्लेक्स के एक गेट के बाहर 32 फुट नीचे रखा था। इस कैप्सूल को कालपत्र नाम दिया था। राजनीतिक विरोध के बाद स्वतंत्रता के बाद से 15 अगस्त 1972 तक के भारत का इतिहास दर्ज किया गया था। इस टाइम कैप्सूल को एक हजार साल बाद खोले जाने का लक्ष्य रखा गया था।

IIT कानपुर ने भी स्वर्ण जयंती पर पिछले 50 साल के इतिहास सहेजने के लिए तीन फुट लंबे Time capsule का निर्माण करवाया था। इस कैप्सूल को राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल 6 मार्च 2010 में जमीन के नीचे रखा था। इस टाइम कैप्सूल में आईआईटी में अब तक के सभी रिसर्च, अनुसंधान, शिक्षकों एवं फैकल्टी के बारे में सारी जानकारी सुरक्षित रखी गई हैं। यदि कभी यह दुनिया तबाह भी हो जाए तो आईआईटी कानपुर का इतिहास सुरक्षित रह सके।

विवादों से भी रहा है नाता

गुजरात राज्य के गोल्डन जुबली समारोह के दौरान 2010 को गांधीनगर में प्रदेश के इतिहास को लेकर एक Time capsule महात्मा मंदिर के नीचे रखा गया था। वर्तमान प्रधानमंत्री और तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर विपक्ष ने आरोप लगाया था कि टाइम कैप्सूल में मोदी ने अपनी उपलब्धियों का बढ़चढ़कर बखान किया है।

इसी प्रकार इंदिरा गांधी सरकार के बाद आने वाली जनता पार्टी की सरकार ने 1977 में इस टाइम कैप्सूल को जमीन से खोदकर निकाल लिया था। इस आइम कैप्सूल के कंटेन्ट को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया और यह नष्ट हो गया।

संस्थानों ने भी रखे हैं टाइम कैप्सूल

दक्षिण मुंबई के फोर्ट में स्थित अलेक्जेंड्रा गर्ल्स इंग्लिश इंस्टीट्यूशन नामक स्कूल ने 2014 में एक समय कैप्सूल दबाया था। इस कैप्सूल को खोलने के लिए 1 सितंबर 2062 का समय निर्धारित किया गया है। इस साल स्कूल के दो सौ सल पूरे होंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में इंडियन नेशनल कांग्रेस के दूसरे दिन 4 जनवरी 2019 को पंजाब के जालंधर में स्थित लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के परिसर में एक टाइम-कैप्सूल दफन किया गया था।

इसके अलावा कानपुर के ही चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय में भी Time capsule रखा गया है। इसमें भी कृषि विश्वविद्यालय के इतिहास से संबंधित तमाम तरह की जानकारियों को सहेजकर उसे जमीन के नीचे रखा गया है। अब तक देश में लगभग आधा दर्जन जगहों पर इस तरह के टाइम कैप्सूल पहले भी रखे जा चुके हैं।Authar – DEEPAK SEN

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Awaiting monsoon
Downpour no bars
Dancing bliss

Myself home confined
Standing next to glass covered airy aperture
Admiring in fascination
Tiny droplets falling on each leave
Heard outside , A joyous screech of little kid
Folding hands full of ice

A urban lady
Concealed in umbrella
Saving dress for eye
Clutching Umbrella

Man walking neighbour
Concealed in Umbrella
Lot of time in hand
Soaking freshness inside outside .

Writer – Shipra Dhingra

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Adolscence timid years
Bundle of houseworks glued
Yonker Science pupil
Zoology botany ,calculus stew
Exhaustive,metaculious combi
Bookworm girlhood
Yearned for self possesion of ease

Executive days
Wanna step my foot everywhere
Presence in wee hours
Onus of others scare
looped in FIFO

Tied knot with Urban groom
Bed of roses
Glittery pave
Culinary stamped

Mid age crisis
Shakling bones
Froozen shoulder
Hot flushes
Last in bed
Switch off Tiny bulb
No mess left
Man of house enquires
Awake in first rays of Sun!!

Shipra Dhingra

Iam Shipra Dhingra a IT professional from a decade served in many mnc companies in various roles .Iam also blessed with two kids a Son and daughter to complement life with various colours .we often write /sing in our memories .During lockdown i noted my poems and started ahead .Looking forward in this journey.

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When I was born
I was student after few years
Never knew when I became employee
A employee who can be at any step of ladder
Still just a employee who can be waved goodbye any time
So many years passed other relations a daughter ,wife ,mom ,friends are there but still most prominent a employee
Each day starts with tag
No matter how many Sunrises Sunsets I missed
I found its always dark when I left and enter house

Iam a employee
That tag became so precious I forgot almost I know something beyond
Dont remember Birthdays ,anniversaries but never forgot webinars ,webex ,skype.
one fine day employee tag was taken back
I came back with heavy steps
Everybody in my house asking in brighter sunlight who are you
They know only a employee who talks to them about employment world
They are still figuring who am I

Iam a lost child
Still thinking I miss tag or small luxuries tat tag brought
Never realized I forgot what interests me beyond

Author:

Shipra Dhingra

Iam Shipra Dhingra a IT professional from a decade served in many mnc companies in various roles .Iam also blessed with two kids a Son and daughter to complement life with various colours .we often write /sing in our memories .During lockdown i noted my poems and started ahead .Looking forward in this journey.

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Harssh A Singh was recently seen in Taapsee Pannu and Pavail Gulati-starrer “Thappad”. The actor was associated with theatres for a very long time before venturing into Bollywood. He feels that the Indian theatre is going through a tough phase because there is no money in it.

He says after rehearsing for one play for a period of three months, they get just Rs.2000 per show, and that is not sufficient for survival in big cities like Mumbai or Delhi.

“If you go towards UK, many Oscar-winning actors have started their career from theatre. Their government supports theatre people by giving them grants so that artists can lead a good life and raise their family, but that’s not possible in india. People who do theatre in India, they are considered mad, because there is no money. We rehearse for three months for one play and at end of it we just get Rs. 2000 per show. Can you imagine living with Rs. 2000? How will theatre actors survive with it and that is why theatre, unfortunately, is dying in India,” Harssh said.

“Big names like Nawazuddin Siddiqui and Irrfan Khan have done theatre, but when they came to Mumbai they couldn’t do theatre, because it was hard to survive with that kind of money. So they opted for Bollywood,” he added.

He reveals that though there is no money in theatre, youngsters still consider it as a training ground. However, he admits that once they have done a play or two, they leave for Bollywood.

“If you ask any newcomer, the one who comes from delhi or out of town, they will say I want to do theatre, not because they love watching it, there idea is that theatre is a great training ground so I will get in theatres will do one or two plays, will learn acting and will get into TV or films to make money. It’s very sad but true. Artists from all over world believe because there is no money in theatre and if they want to be here, it won’t be for long. If you are living in mumbai your minimum expenditure is very expensive so for how many years are you going to survive just by doing theatre,” Harssh said.

The “Bajrangi Bhaijaan” star also feels that theatre will always go through a rough phase, but it will die and revive again because of the people who are just so passionate about it.

“Theatre will die, it will keep going through hardships and terrible things but there will always be people who want to be in theatre, because if someone enjoys doing theatre, they will not enjoy anything else. Even if they do films, TV, webseries, they will always come back to the stage, for example, look at artists like Naseeruddin Shah and Rajat Kapoor,” Harssh said.

Harssh recently became part of a video by the theatre community for the others who are struggling during these tough times.

Talking about the video, he said, “The song was conceptualised by Asif Ali Baig, an incredible theatre artist. He wanted to write a song for people who love theatre and like I said people who love theatre they don’t do it for money, they do it because they love the art form. This came from the fear that once the lockdown ends will people come to theatre, will they buy tickets, will it be possible. The video was conceptualised from that fear that theatre will never die, they will all be back some how or the other. I decided to become part of it because through this we want to create awareness and raise money for the artists whose income has been stopped.”