April 5, 2020
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भद्रवाह (जम्मू-कश्मीर)। बर्फबारी और शीत लहर की चपेट में कश्मीर के इलाके  बेशक कटे हुए हों। लेकिन कश्मीर के भद्रवाह इलाके में इन दिनों कल्चरल फेसिटवल मनाया जा रहा है। इस इलाके के लोगों ने इस कल्चरल फेस्टिवल में खूब जमकर अपने पारंपरिक नृत्य को किया। बर्फबारी के बावजूद इस कार्यक्रम में पहुंचे केंद्रीय संस्कृति मंत्री प्रह्लाद पटेल ने कार्यक्रम में कहा कि इस इलाके को सरकार टूरिज्म हब की तरह विकसित करने के लिए प्रयास जारी हैं।

सरकार यहां महिलाओं को टूरिस्ट गाइड की मुफ्त में ट्रेनिंग तो देगी ही साथ ही लोगों को होम स्टे के लिए फंड भी उपलब्ध कराएगी। पिछले कुछ दिनों से डोडा जिले के भद्रवाह शहर में विंटर कल्चरल फेस्टिवल चल रहा है। इसमें पूरे इलाके के स्कूल के बच्चों और लोगों ने भाग लिया। जम्मू-कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश बनाने के बाद जम्म-कश्मीर में अपनी तरह का ये पहला फेस्टिवल था। जिसमें शिरकत करने खुद केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री प्रह्लाद पटेल पहुंचे।

उन्होंने यहां एक पर्यटन केंद्र का उद्घाटन किया, साथ ही इलाके को टूरिस्ट हब बनाने की बात भी कही। उन्होंने अधिकारियों से इलाके में इको टूरिज्म भी विकसित करने के बारे में चर्चा की। पिछले पांच दिनों से चल रहे इस फेस्टिवल को स्मार्टसिटी फाउंडेशन ने आयोजित किया था। इस कार्यक्रम में पूरे इलाके करीब 500 छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया।

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Nasik :  Saptashringi ( सप्तश्रृंगी, Saptaśrr̥ṇgī)Temple is a site of Hindu pilgrimage situated 72 kilo meter from Nashik . According to Hindu traditions, the goddess Saptashrungi Nivasini dwells within the seven mountain peaks. (Sapta means seven and shrung means peaks.) It is located in Nanduri, Kalwan taluka, a small village near Nashik .

The Marathas and some Bhil tribes worship the goddess from a long time and some worship as their kuldaivat. There are 510 steps to climb the gad. Devotees visit this place in large numbers every day.The temple is also known popularly as one of the “three and half Shakti Peethas” of Maharashtra.

The temple is also one among the 51 Shakti Peethas located on the Indian subcontinent and is a location where one of Sati’s (wife of Lord Shiva) limbs, her right arm is reported to have fallen. Its half shaktipeeth among three and half shaktipeeth of Maharashtra. Photo Girish Srivastav/ 24.12.2019

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Rahul Bhuchar, Producer and MD, Felicity Theatre who is playing the eponymous role of Karn in the play Mahabharat which was essayed by Pankaj Dheer in the original TV serial Mahbaharat directed by B.R. Chopra and his son Ravi Chopra thirty one years ago and telecast on Doordarshan, says ‘Recreating Mahabharata with some of the finest talents from cinema and television has truly been a fascinating journey.

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हर एक बात पे कहते हो तुम के तू क्या है।
तुम ही कहो के ये अंदाज ए गुफ्तगू क्या है।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल।
जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।
बना है शाह का मुसाहिब फिर ए है इतराता।
वगरना शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है।

मिर्ज़ा गालिब के जिसका पूरा नाम मिर्ज़ा असदुल्ला खान गालिब था, का जन्म 27 दिसंबर सन 1797 में हुआ, गालिब आगरा में पैदा हुए और उनकी शुरुआती शिक्षा दीक्षा भी आगरा में ही हुई, आपके पिताजी रियासत अलवर के बादशाह बख्तावर सिंह के यहां मुलाजिम थे, मगर गालिब की पैदाइश के कुछ सालों बाद ही इनके पिताजी खाना जंगी का शिकार हुए और गोली लगने पर उनका इंतकाल हो गया, उसके बाद इनकी देखरेख इनके चाचा नसरुल्ला बेग ने की जो आगरा में मराठों की तरफ से सूबेदार मुकर्रर किए गए थे, और फिर आगरा पर अंग्रेजों के कब्जे के बाद वहां के कमिश्नर मुकर्रर कर दिए गए, लेकिन जब गालिब सिर्फ 9 साल के थे तभी इनके चाचा का इंतकाल हाथी के ऊपर से गिरने से हो गया।

गालिब ने जब होश संभाला तो मुगलिया सल्तनत का सूरज डूबा जाता था, और मुगलों के आखिरी नवाब बहादुर शाह जफर की इज्जत सिर्फ उनके किले तक ही महदूद रह गई थी, इसके उलट उर्दू अदब और उर्दू शायरी अपने पूरे परवान पर थी, लेकिन शायद बहुत कम लोगों को ये मालूम होगा कि गालिब ने अपनी शायरी की शुरुआत फारसी ज़बान से की। उर्दू में कुछ वक्त बाद लिखना शुरू किया उनकी एक बड़ी मशहूर ग़ज़ल है जो मुझे काफी पसंद है।

नक्श फरियादी है किसकी शोखिए तहरीर का।
कागजी है पैरहन हर पैक अरे तस्वीर का।
जज़्बाए बे इख्तियार ए शौख देखा चाहिए।
सीन आए शमशीर से बाहर है दम शमशीर का।
बस के गालिब हूं असीर ई में भी आतिश जेरे पा।
मुए आतिश दीदा है हल्का मेरी ज़ंजीर का।

गालिब ने फारसी की तालीम और शतरंज की तालीम मौलवी मुआजम से और उर्दू की तालीम मौलाना अब्दुल बारी साहब से लि।
आप 11 साल तक अपने ननिहाल में रहे जो कि आगरा ही में था फिर उसके बाद आप दिल्ली के चांदनी चौक के पास बल्लीमारान के कासिम जान गली में आए और वहीं रहने लग गए, जहां गालिब की हवेली आज भी वैसी ही है, मैं दो बार गालिब की हवेली जा चुका हूं और जब मैं गया और जब मैं वहां से वापस आया तो मुझे मिर्ज़ा गालिब का एक शेर याद आता है बार-बार।।

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले।
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
निकलना खुल्द से आदम का सुनते आए थे लेकिन।
बहुत बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।

मुझे मिर्ज़ा के ये शेर इसलिए याद आते हैं क्योंकि उनकी हवेली की ऐसी हालत देखकर कलेजा छलनी छलनी हो जाता है, मैं जब उनकी हवेली में पहली बार गया तो मुझे जाने के बाद ऐसा बिल्कुल नहीं लगा कि आज से डेढ़ सौ साल पहले उर्दू अदब का भगवान रहा करता होगा वहां।
गालिब को जितनी शोहरत हासिल आज है उतनी उनके जीते जी नहीं थी, उन्होंने काफी मुफलिसी का सामना किया लेकिन इसके बावजूद भी उनकी शायरी पर कोई रुकावट नहीं आई उल्टे उनकी शायरी में और निखार आता रहा।

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे।
कहते हैं कि गालिब का है अंदाज ए बयां और।

सही में गालिब का अंदाज सबसे निराला और ग़ालिब वाहिद एक ऐसा शायर था जो अपने जमाने में मशहूर ना होने के बावजूद भी महबूब शायर था, और आज ग़ालिब मशहूर भी हैं और महबूब भी।
एक बहुत बड़े उर्दू के जानकार प्रोफेसर गोपीचंद नारंग गालिब के बारे में कहते हैं कि मुगलों ने हिंदुस्तान को तीन बहुत नायाब तौहफे दिए, पहला ताजमहल, दूसरा उर्दू ज़ुबान, और तीसरे मिर्ज़ा गालिब,।
मुझे भी ऐसा ही लगता है कि अगर ग़ालिब ना होते तो उर्दू ज़बान उर्दू शायरी उर्दू अदब और उर्दू कल्चर का हुस्न अधूरा ही रहता, मेरी नजर में गालिब एक ऐसे शायर हैं कि जिनको आप पसंद और नापसंद तो कर सकते हैं, लेकिन आप उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते।

इब्ने मरियम हुआ करे कोई।
मेरे दुख की दवा करे कोई।
बक रहा हूं जुनू में क्या क्या मैं।
कुछ ना समझे खुदा करें कोई।

मैंने अपने बड़े बुजुर्गों से नवाब जान के बारे में भी सुना है जो दिल्ली की मशहूर तवायफ थी और गालिब पर अपना दिल हार बैठी थी, और शायद गालिब भी उनसे इश्क करने लग गए थे,, कहते हैं कि नवाब जान जब गालिब की ग़ज़लें गाती थी तो उनके कोठे की रौनक देखते बनती थी, लेकिन जमाने वालों ने किसके इश्क को सर माथे लिया है, कहने वालों ने तो मीराबाई तक को कृष्ण की रखैल कह दिया, तो नवाब जान को भी परेशानियों का सामना करना पड़ा और इसी वजह से उन्हें दिल्ली छोड़कर बनारस की तरफ कूच करना पड़ा, कहते हैं कि गालिब जब अपने पेंशन के सिलसिले में कोलकाता जा रहे थे तो उनका बनारस भी रुकना हुआ और फिर नवाब जान के घर भी गए, लेकिन वहां जाकर उन्हें मालूम चला कि अब उनकी माशूका नहीं रहीं उनका इंतकाल हो गया।

ये ना थी हमारी किस्मत के विसाले यार होता।
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।

गालिब नवाब जान की मौत के बाद काफी टूट गए थे, और कुदरत का करिश्मा तो देखिए कि जिस पेंशन के सिलसिले में गए वो काम भी नहीं हो पाया, और फिर जब गालिब दिल्ली आए तो मानो जैसे उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, उनका एक ही बेटा जो कुछ महीनों का था वो मर चुका था, इससे भी गालिब को काफी धक्का लगा।
आगे चलकर गालिब को शराब और जुए की बहुत ज्यादा लत लग चुकी थी, एक बड़ा मशहूर किस्सा है, उनसे एक बार किसी ने पूछा कि मिर्ज़ा तुम इतनी शराब क्यों पीते हो, तो उन्होंने पलटकर कहा, देखो मियां खुदा ने सबके खाने का इंतजाम किया है तो पीने का इंतजाम मैं खुद ही कर लेता हूं।

ये मसाले तसव्वुफ ये तेरा बयान गालिब।
तुझे हम वली समझते जो ना बादाखार होता

कहा जाता है कि गालिब नास्तिक थे लेकिन गालिब ने एक शेर कहा है जो सुनकर मुझे नहीं लगता कि ग़ालिब नास्तिक थे।

बनाकर फकीरों का हम भेस गालिब।
तमाशा ए एहले करम देखते हैं।

गालिब मेरी नजर में एक सूफी संत थे, जो आज भी अपनी शायरी और अपनी लेखनी के जरिए जिंदा हैं, मेरा मानना है कि जिनकी शायरी जिंदा होती है वह कभी मरा नहीं करते शब्दों के जरिए हमेशा हमेशा के लिए जिंदा रह जाते हैं, और गालिब उन शायरों में शुमार होते हैं जो शायद कयामत के बाद भी पढ़े जाएं।

गालिब ने हर उस मौजू को छूने की कोशिश की जो एक आम इंसान सोचता है, इसीलिए गालिब सबसे मुश्किल शायर होने के बावजूद भी आवाम के शायर रहे।
गालिब ने अपनी सारी जिंदगी सिर्फ लिखने का ही काम किया, उन्होंने उर्दू और फारसी ज़बान की जितनी खिदमत की मुझे नहीं लगता किसी और ने की होगी, दीवान ए ग़ालिब नाम से उनका मशहूर ग़ज़ल संग्रह जो आज भी बहुत पढ़ा जाने वाला किताब है, इसके अलावा उन्होंने खत लिखें जो बहुत मशहूर हैं, नज़्में बच्चों के लिए कायदा और बहुत कुछ लिखा।

गालिब से मेरी मुलाकात गुलजार साहब के जरिए हुई, मेरी 12वीं के इंतिहान थे और पढ़ाई में मन नहीं लग रहा था तो सोचा कि थोड़ी तफरी की जाए, उसी वक्त मैंने गुलजार साहब का बनाया हुआ नाटक, मिर्ज़ा ग़ालिब देखा, फिर तो गालिब का जैसे मैं दीवाना सा हो गया।

गालिब ने शायरी के अलावा मुगल सल्तनत के आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफर की और उनके खानदान की तारीख भी लिखी, मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है कि मुगलों के पतन की कहानी गालिब से अच्छा कोई नहीं लिख सकता था।

गालिब ने अपने आखिरी दिन बल्लीमारान के कासिम जान गली वाली हवेली में ही बिताई, यहीं पर रहकर आपने 1857 का खौफनाक मंजर देखा, और यही रहते हुए आपको मालूम चला कि बहादुर शाह जफर को रंगून भेज दिया गया है, और उनके बेटों का सर काटकर खूनी दरवाजे पर लटका दिया गया है, और अब दिल्ली पर भी अंग्रेजों का कब्जा हो गया है।

गालिब इसके 12 साल बाद यानी अट्ठारह सौ 69 को पर्दा कर गए, लेकिन खुदा की मर्जी तो देखिए ग़ालिब साहब के मरने के बाद उन्हें दफनाया भी गया तो हजरत निजामुद्दीन औलिया साहब की मजार के पीछे, लेकिन दुख तब होता है जब मालूम चलता है की उर्दू अदब के भगवान गालिब के मजार की देखरेख करने वाला आज कोई नहीं है।

दर्द मिन्नत कश ए दवा ना हुआ।
मैं ना अच्छा हुआ बुरा ना हुआ।
कुछ तो पढ़िए के लोग कहते हैं।
आज गालिब ग़ज़ल सरा ना हुआ।

©राजीव साहिर।
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अगर आपको मेरी कहानियां गंदी लगती हैं या अश्लील लगती है, तो इसमें मेरी कोई गलती नहीं है क्योंकि आप ही गंदे और अश्लील समाज में रहते हैं, मेरी कहानियां तो समाज को आइना दिखाने का काम करती है, मंटो ऐसा अक्सर कहा करता था।

मंटो न तो हिंदुस्तान का अफसाना निगार था न पाकिस्तान का अफसाना निगार, और ना ही एशिया महाद्वीप का। बल्कि मंटो तो एक ख्याति प्राप्त कहानीकार था।

मंटो जिसका पूरा नाम सआदत हसन मंटो था, का जन्म 11 मई सन 1912 को पंजाब के एक छोटे से गांव समराला में हुआ था।

मंटो ने लघु कथाओं के अलावा रेडियो ड्रामा और फिल्मों की कहानियां भी लिखीं। मंटो एक बहुत अच्छा सहाफी यानी पत्रकार भी था।

वह उर्दू का वाहिद ऐसा लेखक था कि जिसको जितना पसंद किया जाता था उतना ही नापसंद किया जाता था, हां ये बात और है कि मंटो को वही लोग सबसे ज्यादा पढ़ते थे जो मंटो को सबसे ज्यादा गालियां दिया करते थे।

इसी कारण मंटो को 6 बार अदालत भी जाना पड़ा, तीन बार हिंदुस्तान पाकिस्तान बंटवारे से पहले और तीन बार पाकिस्तान के बनने के बाद। फिर बात अलग है कि जिन लोगों ने उस पर मुकदमा दर्ज किया उन लोगों को कोई फायदा नहीं हुआ।

मंटो ने अपनी छोटी सी जिंदगी में भरपूर लेखनी चलायी उन्होंने 22 लघुकथा संग्रह, 1 उपन्यास, पांच रेडियो ड्रामा संग्रह, रचनाओं के तीन संग्रह तथा व्यक्तिगत रेखाचित्रों के दो संग्रह की रचना की।

मेरी नजर में मंटो एक ऐसा अलमस्त अफसाना निगार था कि वो जो देखता था वही कागज पर उतार देता था, उसने उस वक्त में भी समाज के उन चीजों के बारे में बात की जिसे हम आज के वक्त में भी बंद दरवाजों के पीछे किया करते हैं, मंटो ने समाज के ऐसे तबके के बारे में बताया जो हमारे आस पास तो है लेकिन हम उन लोगों के बारे में बात करने से हिचकिचाते हैं।

मंटो को मैं बड़ा अफसाना निगार या बड़ा इंसान इसलिए कहता हूं क्योंकि मंटो आवाम का अफसाना निगार था, मंटो ने हर उस चीज के ख़िलाफ़ लिखा और बोला जो मंटो को गलत लगा, चाहे मंटो कितनी भी गरीबी में रहा हो चाहे उसने अच्छे दिन देखे हों लेकिन कभी भी वह अपने उसूलों से हटा नहीं, इसीलिए वो अपने आप ने महान शख्सियत था।

मंटो मेरी जानकारी में ऐसा लेखक है कि वह जिस जुबान में लिखता था उसी जुबान में कहते हैं 3 बार फेल हुआ, कुछ लोग कहते हैं कि मंटो सिगरेट और शराब बहुत पीता था , मंटो को सिगरेट और शराब की लत इस हद तक लग गई थी कि अगर मंटो को यह ना मिले तो मंटो पागलों जैसा बर्ताव करने लगता था,।

मंटो की कुछ मशहूर कहानियां इस प्रकार है, खोल्डो, ठंडा गोश्त, टोबा टेक सिंह, काली सलवार इत्यादि।

मंटो के अफसाने की एक खास बात यह भी है कि जब आप उस की कहानियां सुनेंगे तो आपको बिल्कुल भी नहीं लगेगा कि आप उसकी कहानियां सुन रहे हैं, बल्कि आपको लगेगा कि आप बंद आंखों से वही होते हुए देख रहे हैं जो मंटो ने अपने अफसानों में कहा है।, उस वक्त के लोग बताते हैं कि मंटो बहुत जिंदादिल, मिलनसार और मजाकिया इंसान था।

मंटो ने 22 साल की उम्र में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया जहां अली सरदार जाफरी जैसे मशहूर शायर की संगत मिली, लेकिन ज्यादा दिन तक अलीगढ़ नहीं रह पाए, वापस अमृतसर आ गए, फिर वहां से लाहौर चले गए, जहां मंटो ने पारस नाम के एक अखबार में नौकरी कर ली, और मुसवविर नाम के एक अखबार का संपादन करने लग गए, फिर मंटू 1939 में दिल्ली आ गए, दिल्ली में सिर्फ 17 महीने ही रहे दिल्ली में ही आकर उन्होंने रेडियो नाटक लिखें साथ ही ऑल इंडिया रेडियो में भी काम करते रहे किन्तु 1942 में मुंबई आ गए, जहां उनको कमाल अमरोही अशोक कुमार वाचा और कृष्ण चन्द्र जैसे लोगों की की संगत मिली।मुंबई में ही आकर उन्होंने फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखी और काफी शोहरत कमाई, लेकिन फिर 1948 में मंटो को लाहौर जाना पड़ा।
लाहौर में अदब और साहित्य का माहौल नहीं था, तो मंटो काफी तन्हा हो गए और शराब में और ज्यादा डूबने लगे, इसी कारण 1955 में किडनी खराब होने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।
लेकिन सहादत हसन मंटो हम सबके दिलों में आज भी जिंदा हैं।
©राजीव साहिर।

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नई दिल्ली : दिवाली हिंदुओं का सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है। दिवाली का त्योहार प्रकाश और उजाले का प्रतीक माना जाता है। इसे बड़ी ही खुशी और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन घरों में दिवाली की परंपरा के अनुसार हम सभी लोग घर के हर कोने में चारों ओर दीपक और मोमबत्तियां जलाते हैं। सभी दोस्तों और रिश्तेदारों को मुबारकबाद देते हैं। मिठाइयां और तोहफे बांटते हैं। इस दिन का बच्चे खास तौर पर इसलिए भी बेसब्री से इंतजार करते हैं, क्यों कि उन्हें पटाखे जलाने को मिलते हैं। नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइट के निदेशक डा.महिपाल सचदेव का कहना है कि पटाखे हमेशा अच्छी लाइसेंस धारक दुकान से ही खरीदने चाहिए। हमेशा बंद बाक्स में ही आतिशबाजी खरीदें। पटाखों को गैस स्टोव या किसी भी ज्वलनशील पदार्थ से दूर रखना चाहिए। पटाखों को खुली जगह पर ही जलाएं। बड़े पटखों को जलाते समय अधिक सावधान रहें। पटाखे जलाने के बाद बची हुई राख या फुलझडियों को एक पानी से भरी हुई बाल्टी में रखें, ताकि वह आपके पैरों के नीचे न लगें और न ही आप को नुकसान पहुंचाए।

डा.महिपाल सचदेव का कहना है कि दिवाली पर पटाखे जलाते समय विशेष तौर पर अपनी आंखों का ख्याल रखना चाहिए। आंख में अगर किसी प्रकार की भी चोट लगी हो तो तुरंत नेत्र विषेशज्ञ से मिलें क्यों कि इस दिन लापरवाही के चक्कर में कई लोग अपनी आंखें भी खो बैठते हैं या कई लोग पटाखे जलाते वक्तअपनी आंखों की रोशनी को नुकसान पहुंचा बैठते हैं। बहुत से लोगों की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली जाती है। इसलिए समूह में इकट्ठे होकर ही पटाखे जलाने चाहिए। इससे त्योहार का आनंद तो दोगुना हो ही जाता है साथ ही बमों को अकेले पटाखे जलाने का मौका नहीं मिलता जिससे कि उन्हें कोई नुकसान पहुंचे।

बच्चों को अकेले पटाखे जलाने के लिए न भेजें। बच्चों को तीर कमान से खेलने के लिए मना करें क्यों कि उससे आंखों में चोट लगने का खतरा बहुत अधिक रहता है। दिवाली के समय आखों में कट, सुपरफिशियल एब्रेशन, ग्लोब इंज्योरी, केमिकल एण्ड थर्मल बर्न हो सकता है। पीडि़त को आंखों में दर्द, लाल होना, सूजन, जलन, आंख खोलने और बंद करने में परेशानी या फिर दिखाई न देना जैसी समस्याएं हो सकती हैं। आंखों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाले पदार्थ होते हैं-अनार, हवाई, तीर कमान आदि। सबसे ज्यादा क्षति तब होती है जब पटाखों को टिन या शीशे की बोतल में रखकर जलाया जाता है ताकि सबसे ज्यादा शोर हो, लेकिन इससे आसपास खड़े लोगों को बहुत नुकसान पहुंच सकता है, इसलिए ऐसा नहीं करना चाहिए। पत्थर और कांच के टुकड़े बहुत तेजी से उड़ते हुए किसी की भी आंख में बहुत अंदर तक चुभ सकते हैं जिससे कि आंखों में भयानक चोट लग सकती है। पटाखों के अंदर से निकला हुआ कार्बन और अन्य विशाक्त पदार्थ आंखों के उत्तकों, नसों और अन्य मुलायम लिगामेंट्स को क्षतिग्रस्त कर सकते हैं। आंख में चोट लगते ही आंख को नल के साफ पानी से छींटे मारें। फिॅर तुरंत किसी अच्छे डाक्टर के पास ले जाएं।

अगर आप की आंखों में चोट लग जाए तो कुछ निम्रलिखित बातों का ध्यान रखें जैसे-
डा.महिपाल सचदेव का कहना है कि चोटिल भाग को न छेड़ें और आंखों को न मलें। अगर ये सुपरफिश्यिल इंज्युरी है, तो आंखों को साफ पानी से धो लें। अगर आंखों से खून निकल रहा हो, दर्द हो या फिर साफ दिखाई न दे तो आंखों को ढंग लें और तुरंत डाक्टर के पास जाएं। अपने आप कोई उपचार न करें। किसी भी आंख की चोट को मामूली न समझें क्यों कि छोटी सी चोट भी हमेशा के लिए आंखों की दृष्टि को हानि पहुंचा सकती है। ये छोटी-छोटी बातें और जानकारी आंखों के इलाज में मदद करती हैं, जिससे पीडि़त जल्दी ही ठीक हो सकता है। ये याद रखिए कि आंखें भगवान का अमूल्य उपहार हैं और उनका ख्याल रखना हमारा परम कर्तव्य है। आंख संबंधी किसी भी समस्या को सुलझाने के लिए डाक्टर से तुरंत संपर्क करें।