April 19, 2019
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Health

Dr KK Aggarwal

The fungus, Candida auris is an emerging “superbug” and is fast becoming a global health threat.

The CDC has added drug-resistant C. auris to a list of germs, which are considered as “urgent threats.”

C. auris has been reported from South Korea, India, Pakistan, Kuwait, Israel, Oman, South Africa, Colombia, Venezuela, the United States, Canada, and Europe, including the United Kingdom, Norway, Germany and Spain (Clin Microbiol Rev. 2017;31(1). pii: e00029-17). A total of 617 cases have been reported in the US till March 29, 2019.

Last year, an elderly man died due to C. auris infection after an abdominal surgery in Mount Sinai Hospital in New York City. The New York Times reported, “The man at Mount Sinai died after 90 days in the hospital, but C. auris did not. Tests showed it was everywhere in his room, so invasive that the hospital needed special cleaning equipment and had to rip out some of the ceiling and floor tiles to eradicate it … Everything was positive — the walls, the bed, the doors, the curtains, the phones, the sink, the whiteboard, the poles, the pump,” said Dr. Scott Lorin, the hospital’s president. “The mattress, the bed rails, the canister holes, the window shades, the ceiling, everything in the room was positive.” (New York Times, April 6, 2019)

C. auris is a deadly infection; immunocompromised persons are more vulnerable to develop this infection. People who recently had surgery, live in nursing homes, or who have breathing tubes, feeding tubes or central venous catheters are especially at higher risk.

Patients can remain colonized with C. auris for a long time and the fungus can survive on hospital surface for long duration. This facilitates spread of C. auris between patients in healthcare facilities.

C. auris can cause different types of infections, including bloodstream infection, wound infection, and ear infection. The symptoms of C. auris infection are not easily identifiable as the patients are already critically ill.

According to the CDC, infection with C. auris is of concern because:

  • It is often multidrug-resistant.
  • It is difficult to identify with standard laboratory methods, and it can be misidentified in labs without specific technology, which can lead to inappropriate management.
  • It has caused outbreaks in healthcare settings. For this reason, it is important to quickly identify C. auris in a hospitalized patient so that healthcare facilities can take special precautions to stop its spread.

(Source: CDC)

खराब होने पर प्राकृतिक जोड़ बदले नहीं बल्कि ठीक किए जाएंगे

घुटने या शरीर के अन्य जोड़ों में चोट लगने पर सबसे अधिक और सबसे पहले कार्टिलेज ही क्षतिग्रस्त होते हैं। अक्सर मामुली चोट लगने पर भी कार्टिलेज को नुकसान पहुंचता है लेकिन लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते हैं। जब उन्हें चलने.फिरने में दिक्कत होने लगती है तब वे इलाज के लिए आर्थोपेडिक विशेषज्ञों के पास पहुंचते हैं लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी होती है और चोट से कार्टिलेज को होने वाला नुकसान काफी बढ़ चुका होता है। जोड़ों की हड्डियों को आपस में जोडऩे वाले कार्टिलेज हमारे शरीर का बहुत ही महत्वपूर्ण संरचना है। यह मजबूत उतक टिश्यू होते है लेकिन हड्डियों की तुलना में अधिक मुलायम एवं लचीले होते हैं। कार्टिलेज विशिष्ट कोशिकाओं से बने होते हैं जिन्हें कोंड्रोसाइट्स कहा जाता है और ये कोशिकाएं बहुत अधिक मात्रा में कॉलेजन फाइबर] प्रोटियोग्लाकैन और इलास्टिन फाइबर से बने एक्स्ट्रासेलुलर मैट्रिक्स यौगिक उत्पादिक करती हैं। हालांकि कार्टिलेज के उतक में अपनी खुद की मरम्मत करने की क्षमता होती है लेकिन इसमें यह क्षमता बहुत ही सीमित होती है क्योंकि इसमें रक्त कोशिकाएं नहीं होती है जबकि ठीक होने की प्रक्रिया के लिए रक्त जरूरी होता है।
जोड़ों में पाया जाने वाला कार्टिलेज यानि आर्टिकुलर कार्टिलेज चिकना होता है। कार्टिलेज जोड़ों को मजबूती से जोड़कर रखता है। कार्टिलेज अगर सही सलामत हो तो हमारे लिए चलना फिरना आसान हो जाता है। कार्टिलेज के कारण जोड़ों की हड्डियां एक दूसरे से रगड़ नहीं खाती है। जब कार्टिलेज घिस जाता है तो हड्डियां एक दूसरे से टकराती हैं जिससे हमारे लिए चलना फिरना मुश्किल हो जाता है।
आर्टिकुलर कार्टिलेज चोट लगने से या सामान्य रूप से घिसने के कारण क्षतिग्रस्त होता है। चूंकि कार्टिलेज अगर एक बार क्षतिग्रस्त हो जाए तो अपने आप ठीक नहीं होता है इसलिए चिकित्सकों ने नए कार्टिलेज के विकास को त्वरित करने के लिए षल्य तकनीकें विकसित की। कार्टिलेज के पुनर्निमाण से मरीज को दर्द से मुक्ति मिलती है और उसके लिए चलना . फिरना आसान हो जाता है और इसके अलावा आर्थराइटिस होने से रोका जा सकता है।
किसी जोड़ की सतह के मुख्य घटक एक विशेष उतक होते हैं जिसे हाइलीन कार्टिलेज कहा जाता है। जब यह क्षतिग्रस्त हो जाता है तो जोड़ों की सतह चिकनी नहीं रह जाती है और हड्यिं आपस में रगड़ खाती है जिससे जोड़ों को और अधिक नुकसान पहुंचता है और चलने.फिरने में काफी दर्द होता है। कार्टिलेज के क्षतिग्रस्त होने से जोड़ों में आर्थराइटिस हो सकती है।
अक्सर कार्टिलेज के खराब होने पर या घुटने में आर्थराइटिस या ओस्टियोआर्थराइटिस होने पर जब मरीज का चलना.फिरना दूभर हो जाता है तो घुटने या अन्य जोड़़ों में इम्प्लांट लगाने की जरूरत पड़ती है जिसके लिए ज्वाइंट रिप्लेसमेंट सर्जरी करनी पड़ती है लेकिन अब कार्टिलेज रिजेनरेशन की नई तकनीकों की बदौलत जोड़ को बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी। कार्टिलेज पुनर्निर्माण के लिए आज अनेक तकनीकों का उपयोग हो रहा है और अनुसंधानकर्ता कार्टिलेज को उत्पन्न करने की नई विधियों का विकास करने का प्रयास कर रहे हैं ताकि लोगों को ओस्टियो आर्थराइटिस के दर्द से मुक्ति मिले और वे अपने प्राकृतिक जोड़ों के साथ ही लंबा जीवन जी सकें।

आटोलोगस कार्टिलेज प्रत्यारोपण

इंडियन कार्टिलेज सोसायटी यानि आईसीएस के वर्तमान अध्यक्ष तथा नई दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो हास्पीटल के ज्वाइंट रिप्लेसमेंट सर्जन डॉ. राजू वैश्य बताते हैं कि पिछले दो दशक के दौरान क्षतिग्रस्त कार्टिलेज के इलाज के क्षेत्र में काफी प्रगति हुई है। आटोलोगस कार्टिलेज प्रत्यारोपण एसीआई कारगर उपचार के रूप में तेजी से विकसित हुआ है। इसके तहत मरीज के शरीर से स्वस्थ कार्टिलेज के एक छोटे हिस्से का उपयोग किया जाता है। इस टुकड़े को अलग करके कार्टिलेज निर्माण करने वाली विशेष कोशिकाओं, जैसे कोंड्रोसाइट्स को मल्टीप्लाई किया जाता है और इसे खराब क्षेत्र में प्रत्योरोपित कर दिया जाता है। खराब क्षेत्र में प्रत्यारोपित होने के बाद यह सुदृढ़ जेल का रूप ले लेता है। इसकी सफलता दर बहुत अधिक है और सभी जोड़ों में कार्टिलेज समस्याओं का उपचार किया जा सकता है। इसमें दोबारा किसी सर्जरी की जरूरत नहीं पड़ती है। मरीज छह से आठ माह के भीतर अपनी सभी गतिविधियां करने लगता है और वे खेलों में भी भाग लेने लगते हैं। इस विधि के माध्यम से जोड़ों की संरचनाए उसका कार्यकलाप एवं बायोमेकेनिक्स पूरी तरह से पूर्व की तरह बहाल हो जाते हैं और इस कारण दोबारा आर्थराइटिस होने की जरूरत खत्म हो जाती है। यह विधि चिकित्सा बीमा के दायरे में आती है।
एसीआई तकनीक का आविष्कार स्वीडन के गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय में 1987 में डॉ. लार्स पिटरसन एवं डॉ. मैट्स ब्रिटबर्ग ने किया था। पिछले 20 सालों में घुटने, टखने, जांघ और कंधे की समस्या से पीडि़त 40 हजार से अधिक मरीजों का इलाज किया जा चुका है। अध्ययनों से पता चलता है कि इस तकनीक से इलाज कराने वाले मरीजों को काफी हद तक दर्द से निजात मिला तथा उनकी रोजमर्रा की गतिविधियों में काफी सुधार आया।

एसीआई की प्रक्रियाएं

इस तकनीक के तहत दो चरणों की प्रक्रिया शामिल है। इसमें नई कार्टिलेज कोषिकाएं उगाई जाती है और इसके बाद क्षतिग्रस्त कार्टिलेज के जगह प्रत्यारोपित किया जाता है। सबसे पहले शरीर की वैसी स्वस्थ जोड़ से स्वस्थ कार्टिलेज को लिया जाता है जिस जोड़ को भार उठाना नहीं पड़ता है। यह आथोस्कोपी प्रक्रिया के जरिए किया जाता है। स्वस्थ कार्टिलेज कोशिकाओं अथवा कोंड्रोसाइट्स से युक्त स्वस्थ उतक को प्रयोगशाला में भेजा जाता है जहां कोशिकाओं का संवर्धन किया जाता है। इसमें तीन से पांच सप्ताह का समय लगता है और इस बीच कोशिकाओं की संख्या काफी बढ़ जाती है। अब संवर्धित कोशिकाओं को आर्थोस्कोपी प्रक्रिया की मदद से क्षतिग्रस्त हिस्से में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है।
यह तकनीक युवा मरीजों के लिए खास तौर पर उपयोगी है। यह उस स्थिति में लाभदायक है जब कार्टिलेज की क्षति बहुत अधिक नहीं हो। इसमें चूंकि मरीज के खुद की कोशिकाओं का उपयोग किया जाता है इसलिए इस बात का खतरा नहीं होता है कि शरीर प्रत्यारोपित उतक को अस्वीकार कर देगा। इस तकनीक के साथ दिक्कत यह है कि इसमें कई सप्ताह का समय लगता है और यह दो चरणों की प्रक्रिया है और दो बाद मरीज के जोड़ में आर्थोस्केपी करनी पड़ती है।
यह तकनीक युवा मरीजों के लिए खास तौर पर उपयोगी है। यह उस स्थिति में लाभदायक है जब कार्टिलेज की क्षति बहुत अधिक नहीं हो। इसमें चूंकि मरीज के खुद की कोशिकाओं का उपयोग किया जाता है इसलिए इस बात का खतरा नहीं होता है कि शरीर प्रत्यारोपित उतक को अस्वीकार कर देगा। इस तकनीक के साथ दिक्कत यह है कि इसमें कई सप्ताह का समय लगता है और यह दो चरणों की प्रक्रिया है और दो बाद मरीज के जोड़ में आर्थोस्केपी करनी पड़ती है।
कार्टिलेज की खराबी को दूर करने के लिए कई अन्य प्रक्रियाओं की भी मदद ली जाती है जिनमें एक है ओस्टियोकोंड्रियल आटोग्राफ्ट प्रत्यारोपण और दूसरी प्रक्रिया है ओस्टियोकांड्रयल आलोग्राफ्ट प्रत्यारोपण।

ओस्टियोकोंड्रियल आटोग्राफ्ट प्रत्यारोपण

इस तकनीक में कार्टिलेज को शरीर की एक जोड से दूसरी जोड़ में स्थानांतरित किया जाता हैं। जोड़ के उस हिस्से से स्वस्थ कार्टिलेज उतक यानि ग्राफ्ट को लिया जाता है, जिस हिस्से को भार नहीं उठाना पड़ता है। इसके बाद क्षतिग्रस्त क्षेत्र की सतह से इसका मिलान किया जाता है और उस जगह पर प्रत्यारोपित किया जाता है। इससे उस जोड़ की सतह पर चिकनी कार्टिलेज निर्मित हो जाता है।
यह तकनीक छोटी कार्टिलेज क्षति के लिए उपयोग में लाई जाती है। इसका कारण यह है कि किसी एक ही जोड़ के सीमित हिस्से से सीमित मात्रा में ही स्वस्थ उतक को लिया जा सकता है।

ओस्टियोकांड्रयल आलोग्राफ्ट प्रत्यारोपण

अगर कार्टिलेज की क्षति बहुत अधिक है तो आलोग्राफ्ट तकनीक का सहारा लेना पड़ता है। किसी कैडेवर दाता से उत्तक लिया जाता है। इसके बाद प्रयोगशाला में इसे रोगाणुमुक्त यानि स्टरलाइज किया जाता है। उसकी जांच की जाती है ताकि यह पता चले कि उससे किसी रोग का संचरण होने का खतरा तो नहीं है। इसके बाद क्षतिग्रस्त कार्टिलेज के आकार के समान इसके आकार दिया जाता है और क्षतिगस्त कार्टिलेज के स्थान पर प्रत्यारोपित कर दिया जाता है।

स्टेम कोशिका एवं टिश्यू इंजीनियरिंग

नवीनतम अनुसंधानों से इस बात की संभावना बनी है कि शरीर खुद ही स्वस्थ कार्टिलेज उतक को विकसित करे। नए अनुसंधानों की बदौलत कार्टिलेज रिजेनरेशन अथवा रेस्टोरेशन की नई तकनीकों की मदद से आने वाले समय में घुटने, कूल्हे और कंधे जैसे जोड़ों के खराब होने पर उन्हें बदले जाने के बजाए उन्हें ठीक किया जाएगा। कार्टिलेज रिजेनरेशन एवं रिस्टोरेशन की नई तकनीकों से अब उम्मीद जगी है कि ओस्टियो आर्थराइटिस एवं अन्य कारणों से खराब होने वाले घुटने एवं अन्य जोड़ों को बदलना नहीं पड़े बल्कि प्राकृतिक जोड़ों को ही ठीक कर दिया जाए।
भारतीय मूल के स्टेम सेल वैज्ञानिक प्रो.डा.ए ए शेट्टी के अनुसार वर्तमान समय में अस्थि चिकित्सा के क्षेत्र नई तकनीकों के विकास होने के बाद से खराब जोड़ों के स्थान पर कृत्रिम जोड़ लगाने के बजाए जोड़ों के उतकों को रिजेनरेट करके प्राकृतिक जोड़ों को बचा लिया जाए। हाल के दिनों में विकसित कार्टिलेज रिजेनरेशन तकनीकों से प्राकृतिक कार्टिलेज बनाने में मदद मिलती है और इस कारण जोड़ों को बदलने की जरूरत या तो खत्म हो जाती है या टाली जा सकती है। इस तरह की तकनीक खास तौर पर उन युवाओं के लिए काफी फायदेमंद साबित होगी जिनके घुटने या अन्य जोड़ कार्टिलेज के क्षतिग्रस्त होने या आर्थराइटिस के कारण खराब हो गए हैं। प्रो. शेट्टी ब्रिटेन में रह रहे हैं और कैंटेबरी क्रिश चर्च यूनिवर्सिटी में स्टेम सेल अनुसंधान के निदेशक हैं। कार्टिलेज रिजनरेशन की नई तकनीक के तहत प्रयोगशाला में मरीज की खुद की कोशिका की मदद से क्षतिग्रस्त हड्डी या कार्टिलेज को ठीक किया जाता है। सबसे पहले मरीज की कोशिकाओं को प्रयोगशाला में सवंर्धित किया
जाता है और मरीज के प्रभावित अंग में इंजेक्ट कर दिया जाता है जो मरीज की रूग्न या क्षतिग्रस्त कोशिका को हटाकर विकसित होने लगती है और प्रभावित अंग दोबारा काम करने लगता है। इसमें कीहोल प्रक्रिया के जरिए मरीज की जोड़ से स्वस्थ्य कार्टिलेज का छोटा सा हिस्सा लिया जाता है और प्रयोगशाला में एक खास विधि के जरिए उसे स्टेम सेल में बदल दिया जाता है और इसके बाद मरीज के क्षतिग्रस्त जोड़ में इंजेक्ट कर दिया जाता है।
डा. राजू वैश्य के अनुसार रिजेनरेटिव कोशिका थिरेपी को अमरीका के फूड एवं औषधि प्रशासन से मंजूरी मिल चुकी है और भारत के कुछ अस्पतालों में इस थेरेपी का उपयोग शुरू हो गया है और आने वाले समय में इस तकनीक के इस्तेमाल में तेजी आने की उम्मीद है। इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में अब तक 10 मरीजों का इलाज हो चुका है। उम्मीद है कि कुछ वर्षों में घुटने एवं अन्य जोड़ों को बदलने की सर्जरी बीते दिनों की बात हो जाए और वृद्धावस्था में भी लोगों के घुटने एवं अन्य जोड़ युवावस्था की तरह काम करे। जिन अस्पतालों में इस तकनीक का उपयोग हो रहा है उनमें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एवं सफदरजंग अस्पताल भी शामिल है।
हालांकि मौजूदा समय में यह तकनीक मंहगी है लेकिन आने वाले समय में इसके सस्ती होने की उम्मीद है। यह तकनीक केवल उन मरीजों के लिए उपयोगी नहीं है जिनके घुटने बहुत अधिक क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। इसके अलावा इस तकनीक के साथ यह दिक्कत है कि इस तकनीक में मरीज का इलाज परम्परागत उपचार तकनीकों की तुलना में अधिक लंबा होता है क्योंकि कोशिका संवंधन में समय लगता है। लेकिन इस तकनीक में सुधार लाने के लिए प्रयास जारी हैं और उम्मीद है कि समय के साथ यह तकनीक अधिक से अधिक विकसित होगी।

Writer – Mr Vinod Kumar

उत्तर पूर्वी भारत अपने लोगों के लिए अत्याधुनिक कैंसर उपचार के हकदार 
शिलांग: त्रिपुरा कैसल ने आज दिल्ली, मुंबई और सात उत्तर पूर्वी राज्यों (असम, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, नागालैंड) से आए प्रमुख कैंसर विशेषज्ञों, रणनीतिकारों, प्रशासकों, उद्योग नेताओं के बीच आधुनिक तकनीकों के बारे में बातचीत की। इस कार्यक्रम का उद्घाटन डॉ.रवि मेहरोत्रा, डॉ.अमल कटकी, डॉक्टर डी.वी. थप्पा, अशोक बाजपेयी जैसे प्रख्यात नेताओं ने किया।आयोजन के अध्यक्ष डॉक्टर फिरोज पाशा के अनुसार इस कार्यक्रम का लक्ष्य फेफड़ों, स्तन यकृत, पेरिटोनियम, मस्तिष्क और बचपन के कैंसर के निदान और उपचार के क्षेत्र में विकास फैलाना है, ताकि यहां के असहाय मरीजों को वो जीवनदान मिल सके, जो देश के बाकी क्षेत्रों के मरीजों को मिल रहा है। शिलांग के प्रमुख चिकित्सा पेशेवरों ने इस कार्यक्रम में भाग लिया और आम जनता को इन बीमारियों के बारे में जागरुक करने की कोशिश की।न्यूरो-ऑन्कोलॉजी के विकास, बाल चिकित्सा कैंसर में परिणामों की बेहतर, ट्रिपल निगेटिव ब्रेस्ट कैंसर के उपचार और प्रेशराइज्ड इंट्रा पेरिटोनियल एरोसोल थेरेपी के उपयोग जैसे कई विषयों पर दिए गए लेक्चर इस इवेंट के मुख्य आकर्षण का कारण थे। बीसीपीबीएफ-द कैंसर फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉक्टर समीर कौल का कहना है कि, “ब्रेस्ट कैंसर महिलाओं की मृत्यु और अन्य बढ़ते हुए रोगों का प्रमुख कारण है। जेनेटिकल कैंसर के मामलों में कैंसर जीन के फैलने के चांसेस लगभग 10 प्रतिशत ज्यादा होते है, जबकि अभी भी 90 प्रतिशत मामले छोटे-मोटे होते हैं। यदि एक महिला को 40 वर्ष की आयु के भीतर स्तन कैंसर का पता चलता है, तो उनमें ओवेरियन और ब्रेस्ट कैंसर दोनों के लिए जोखिम का खतरा दोगुना हो जाता है। कैंसर के विकास का खतरा तब भी बढ़ जाता है, जब 60 साल से कम उम्र की महिलाओं में ट्रिपल निगेटिव ब्रेस्ट कैंसर होता है। इस कैंसर में एस्ट्रोजन रिसेप्टर्स, प्रोजेस्टेरोन रिसेप्टर्स और मानव एपिडर्मल ग्रोथ फैक्टर रिसेप्टर की कमी होती है।” ग्लोबोकैन 2018 भारत द्वारा प्रदान किए गए, हाल के आंकड़ों के अनुसार, 2018 में कैंसर के नए रोगियों की संख्या में 3 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी और मृत्यु दर 30 प्रतिशत दर्ज की गई थी। पिछले 5 सालों में कुल प्रचलित मामलों में लगभग 80 हजार रोगियों के मामलों में मृत्यु दर लगभग 40 प्रतिशत तक रही है।बीसीपीबीएफ – द कैंसर फाउंडेशन की महासचिव मृदुल अरोड़ा का कहना है कि “हमारा प्रयास है कि हम भारत में अपने डॉक्टरों और रोगियों के लिए सर्वश्रेष्ठ वैश्विक कैंसर अनुसंधान के लाभ लेकर आएं और साथ ही दिल्ली में राष्ट्रीय कैंसर नीति निर्माताओं की जरूरतों और आकांक्षाओं को जमीनी स्तर पर पूरा कर सकें।” लीडिंग फाउंडेशन, थिंक टैंक एंड पेसेंट एडवोकेट 2004 से भारत में आर्थिक रूप से असहाय कैंसर रोगियों को मदद प्रदान करती आ रही है।

North East India deserves state of art cancer treatment for its people

Shillong: Tripura Castle today hosted a path breaking interaction between leading cancer specialists, Strategist, Administrators, Industry leaders drawn from Delhi, Mumbai and Seven North Eastern States (Assam, Meghalaya, Mizoram, Tripura, Arunachal Pradesh, Manipur, Nagaland).

This event was inaugurated by eminent leaders in their field like Dr Ravi Mehrotra, Dr Amal Kataki, Dr D.M. Thappa, Mr Ashok Bajpai.

According to Dr Feroz Pasha, Organizing Chairperson the motive is to bring recent advances in the field of diagnosis and treatment of cancers of lung, breast liver, peritoneum, brain and childhood to this region so that hapless patients here have better chances of survival like their counterparts in the rest of the country. Leading medical professionals of Shillong participated in the proceedings and committed to increase awareness about these diseases amongst the general public.

The highlights of this stellar event included lectures on Advances in neuro-oncology, betterment of outcomes in pediatric cancers, defeating Triple Negative Breast Cancer and use of Pressurized Intra Peritoneal Aerosol Chemotherapy. Animated discussions on Personalized/ Precision approach to cancer treatment, Targeted therapy for Lung cancers were carried out.

“Breast cancer remains the leading cause of mortality and morbidity among female cancer patients. Inherited mutations in the genes accounts for around 10% increased chances to pass on the cancerous genes; still 90% of the cases are sporadic. The risk factor for both ovarian and breast cancer doubles in females if a female has been diagnosed with breast cancer within the age bracket of 40 years. The risk for developing cancer also increases if women under the age of 60 years have triple negative breast cancer, which are a type of breast cancer that lacks estrogen receptors, progesterone receptors and human epidermal growth factor receptor 2.”Said Dr Sameer Kaul, President, bcpbf-The Cancer Foundation.

According to the recent data provided by Globacan 2018, India, there is a 3% rise in the number of new patients diagnosed with cancer, and the mortality rate was registered at 30% in 2018. Of the total prevalent cases in the last 5 years accounting for around 80000 patients, the mortality rate is attributed to around 40%.

“It is our endeavour to bring the fruits of best global cancer research to our doctors and patients in India and at the same time transfer needs and aspirations at the grassroots to national cancer policy makers in Delhi” said Ms Mridul Arora, General Secretary,bcpbf-The Cancer Foundation. 

The foundation a leading Cancer Think Tank and Patient Advocate has actively been providing help to financially constrained cancer patients in India since 2004.

नई दिल्ली: एचएसएससी ने हाल ही में भारत में अपने ट्रेनिंग ऑफ ट्रेनर्स (टीओटी) कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक आयोजित किया। प्रशिक्षण कार्यक्रम केरल, चेन्नई,  उत्तर प्रदेश, नई दिल्ली और बिहार सहित देश भर के विभिन्न स्थानों में भी आयोजित किया गया था। देश भर में 10 दिनों के इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में 226 से अधिक प्रशिक्षकों ने भाग लिया। यह प्रशिक्षण जनरल ड्यूटी असिस्टेंट, मेडिकल रिकॉर्ड्स और हेल्थ इंफार्मेशन टेक्नीशियन, इमरजेंसी मेडिकल टेक्नीशियन – बेसिक, होम हेल्थ एड, फार्मेसी असिस्टेंट, मेडिकल लेबोरेटरी टेक्नीशियन, फ्लेबॉटमी टेक्नीशियन, ब्लड बैंक टेक्नीशियन, ऑपरेटिंग थियेटर टेक्नीशियन, विजन टेक्नीशियन, रिफ्रैक्शनिस्ट, रेडियोलॉजी टेक्नीशियन, एक्स-रे टेक्नीशियन और डायलिसिस टेक्नीशियन सहित कार्य से संबंधित कई भूमिकाओं के लिए आयोजित किया गया था।
टीओटी लखनऊ, उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री आरोग्य मित्र (पीएमएएम) के लिए प्रशिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए एनएचए (राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण) के सहयोग से भी आयोजित किया गया था। पीएमएएम के लिए प्रमाणित प्रशिक्षक देश में प्रधानमंत्री आरोग्य मित्र (पीएमएएम) के लिए प्रशिक्षण आयोजित करेंगे जिससे देश में प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएम-जेएवाई) के कार्यान्वयन को बढ़ावा मिलेगा।
एचएसएससी कीे अध्यक्षा डॉ.शबनम सिंह ने कहा कि, ‘‘दुनिया भर में और भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार किया जा रहा है। हमें अभी भी सभी के लिए एक पर्याप्त स्वास्थ्य प्रणाली स्थापित करने के लिए लंबा रास्ता तय करना है। अच्छी तरह से प्रशिक्षित हेल्थकेयर प्रोफेशनलों की मांग में तेजी से वृद्धि हो रही है, जिसके कारण प्रशिक्षकों का क्षमता निर्माण एक उभरती हुई चुनौती है और इसलिए योग्य और प्रमाणित प्रशिक्षक की महत्वपूर्ण और मौलिक भूमिका को पहचानना महत्वपूर्ण है। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण  कौशल को बढ़ाकर प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण और विकास की आवश्यकता को पूरा करते हैं।’’ 
प्रशिक्षण सत्र के दौरान, सभी योग्य उम्मीदवारों ने उन्नत प्रशिक्षण कौशल हासिल किया और उन्हें उद्योग के विशेषज्ञों और अत्यधिक योग्य प्रोफेशनलों के साथ जुड़ने का अवसर भी दिया गया। सभी उम्मीदवारों को प्रशिक्षण के दौरान बारीकी से देखा गया और उन्हें सुधार के क्षेत्र में जानकारी प्रदान की गई। प्रशिक्षण सत्र के सफल समापन पर उम्मीदवारों को एचएसएससी और एनएसडीसी द्वारा एक प्रमाण पत्र प्रदान किया गया, जिससे वे छात्रों को प्रशिक्षण प्रदान करने में सक्षम हो गए।
प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य शिक्षण सत्रों को सुविधाजनक बनाने और मूल्यांकन के माध्यम से अपने अभ्यास में सुधार करने के लिए स्वयं-प्रशिक्षण, सुविधा और शिक्षण के तौर-तरीकों को विकसित करना और बढ़ाना है। एचएसएससी ने इस वर्ष पूरे भारत में 40 से अधिक ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए हैं। पूरे भारत में 1500 से अधिक उम्मीदवारों का मूल्यांकन किया गया है और प्रशिक्षक के रूप में प्रमाणित किया गया है।

Spiritual healer Amiben Modi shares the five secrets of good health this World Health Day. Here is what she has to say!

Health is wealth, that’s the ultimate truth. If you’re healthy, you can conquer the world and achieve all your goals. Physical health is a very important component yet, complete physical health is incomplete without mental well-being. According to me, the most healthy people are the ones who have a healthy mind and spirit. Their outlook for life is positive, they carry welcoming energy wherever they go!

Secrets of health:

  1. Drink water, eat well is the most obvious yet basic foundation of good health
  2. Spend 30 mins outdoor every morning walk in a garden, look at the flowers or play a sport
  3. Relax and reassure yourself every day that life is beautiful and you’re blessed anyway you do this is true meditation.

I wish that for every individual reading this blog that their mind body and spirit are aligned, there is complete well-being leading to the best of health!

Indians visited their doctors 3.2 times a year in 2018, up from 2.7 times in 2017

● Urban Indians visit 2x more often than Indians in smaller towns and cities
● Out of the 7 metros, Bangaloreons visit the most at 4.8 times a year, while Delhites the least, at 3.8 times
● Gynecology, Dermatology and Pediatrics emerge as top three specialties

India, April 4, 2019: Practo, India’s largest Digital Healthcare platform, today released its third edition of India’s annual healthcare map, highlighting key consumer healthcare trends, concerns and behaviour.

The healthcare map has been compiled from data of hundreds of thousands of searches and appointments, by over 13 crore patients, across 50+ cities and 250+ specialities, in 2018.

The report demonstrates the rise in adoption of digital healthcare in the country. With 65% of its population below the age of 35, India, at a median age of 29 years, is using digital technology to actively get in touch with doctors, using both online and offline channels. As India ages over the coming years, the company sees this number going up. Japan, for instance, at a median age of 47, visits doctors 13 times, while the US at a median age of 37, visits doctors a little over 4 times.

Practo believes three primary causes driving this trend include:

  1. Greater awareness : More information about diseases, illness from varied sources
  2. Increased accessibility : Ability to get in touch with doctors at the touch of a button
  3. Growth in lifestyle diseases, disorders like Diabetes, Obesity, Deficiencies like Vitamin D, Calcium, to name a few

“Healthcare is slowly becoming a key priority for Indians. Improving doctor-patient ratio overnight is not possible, hence, it’s important to increase efficiencies, make it more accessible and affordable.” Organized Medicine Academic Guild feels that “as young India gets older, the need for medical supervision will only go up and Digital healthcare companies like Practo will play a huge role in that.”

A further breakdown into the above brought out the following interesting insights:

How Different Cities are faring, in terms of doctor visits:

● Indians in Metros cities see their doctors 4.2 times a year, while, in non-metro cities, just 2 times!
● In metros 1 out of 4 Indians visit their doctors more than 5 times a year, while in non-metros a mere 6% visit their doctors more than 5 times!
● Amongst metros, Bangalore is the highest at 4.8 times, followed by Pune – 4.7, Chennai – 4.2, Kolkata – 4.2, Hyderabad – 4.1, Mumbai – 3.9 and finally Delhi – 3.8
● Amongst non-metros, Indore and Kanpur rank highest, where people were visiting their doctors 3.3 times in the year followed by Nagpur at 3.1 times
● An average Indian visits 2 specialists in a year
● Indians consult 2.6 times online; 2.7 times in Metros and 2.6 times in non-metros

Top Specialities and Ailments

● Gynecologist: PCOD/PCOS, breast pain, urinary tract infection
● Dermatologist: Psoriasis, fungal infection, chemical peels
● Pediatrician: Head lice, asthma, ADHD
● General Physician: Fever, stomach ache, cough and cold
● Orthopedist: Lower back pain, knee pain, sciatica {Adults (usually between the ages 30 and 50) generally suffer from sciatica. Sedentary lifestyle, excessive smoking, diabetes, genetic predisposition, sustained periods of sitting or standing, bad posture, pregnancy, excessive wear and tear of the intervertebral disks including due to manual labor, sports activities, etc. are the major causes of sciatica in adults}

Rise of lifestyle related issues!

● Visits to Rheumatologists increased by 53.8% indicating a rise in the incidents of arthritis related complications and gout
● Endocrinologists saw 45.8% increase in patients suffering from hyperthyroidism, diabetes and hormonal imbalance
○ Diabetologist also witnessed a growth of 38% since last year
● There was a rise of 55% in incidents being reported to Paediatricians for asthma. An acute rise in the pollution levels of the country could have been one of the primary causes of these incidents with children being highly vulnerable to respiratory ailments
● Obesity was also amongst the top health issues in the country with a rise of 52% in doctor appointments. Major areas of concern for the patients included lifestyle modification and weight loss
● The medicines ordered in the highest quantities online include
○ Shelcal, D Rise, Calcirol, and Uprise – all drugs that are used to treat calcium deficiency, vitamin D deficiency, osteoporosis, to name a few. The search volume for drugs prescribed for Vitamin D deficiency and osteoporosis increased by 127% and 114% respectively from 2017 to 2019. There has also been a 84.25% growth in Vitamin D profile tests and 75.71% in Calcium tests since last year
○ Huminsulin, Galvus, Eglucent, and Janumet – drugs used to treat Diabetes. The search volume for drugs prescribed for diabetes also suggests the same; it has grown by 39% from 2017 to 2019. The data suggest an increase in the number of diabetic patients as well as increased awareness about diabetes in the population.

Sexual Health and Online Consult
Registering a growth of 268% since last year, sexual health has been the top most concern for Teleconsult users in India, especially in Delhi, Bangalore and Mumbai. Furthermore, around 70% of all sexual health consultation requests came from patients under 30 years of age.

● 43% of all consults come from women, while 57% from men
● 76% of women who do sexual health consultations are under 30
● 64% of men who do sexual health consultations are under 30
● Sexual health constitutes 31.6% of total online consults that happened in India in 2018, while Dermatology at 17.1% stands as distant second: a difference of 84.6%!
● Jaipur is fastest growing non metro city with 525% growth from 2017
○ Lucknow and Ahmedabad follow

For men across all age groups (from less than 30 to more than 50), sex-related queries, masturbation and erectile dysfunction were discussed majority of times. For women in the same age groups, queries regarding periods, pregnancy, breast cancer were discussed the most. Ongoing stress is one of the biggest culprits leading to irregular periods as well as erectile dysfunction in adults aged between 30 and 50. Other factors influencing erectile dysfunction and irregular menstrual periods include tobacco and alcohol use, obesity, chronic diseases such as hypertension and diabetes, etc.

Mental Health and Non Metros cities
While Mental health remained a widely ignored topic in our country since ages, a paradigm shift is being observed in this regards. According to the Practo Insights report, Indians outside of the 7 Metro cities are consulting specialists in these areas, more than ever before!
● 82% increase was seen in the appointments with Psychologists, Psychiatrists and Psychotherapists in tier 2 cities, to consult for depression, post-traumatic stress disorder (PTSD), marriage counselling, stress, deaddiction and anger management among others
● This also indicates the unhealthy lifestyle habits, long working hours and work-life imbalance taking a toll on people and their mental health

The Practo healthmap provides the most comprehensive healthcare report for India and highlights important ailments and consultation related trends in the country. The report is entirely based on anonymised actual patient actions (booking appointments) rather than surveys.

Practo is India’s largest healthcare platform. Our mission is to help people live healthier, longer lives and that begins with access to better insights.

47.5% women reported having experienced body shaming at their school or work place

How many times have people told you that you look fat? You don’t have a pretty face? You are too skinny? A bag o’bones? A barrel of fries? Or you should wear more makeup to look beautiful? If it had happened to you even once, then you were a victim of Body Shaming. Fortis Healthcare conducted a survey among 1244 women (between the ages of 15 to 65) across 20 cities (including Delhi NCR, Mumbai, Bengaluru, Hyderabad, Chennai, Amritsar, Ludhiana, Jalandhar, Mohali, etc.) in order to gain an insight into the attitudes and perceptions of women towards the concept of body image, as well as the impact that body shaming has on their psychological well-being and at times leading to stress.

The Key Findings of the survey are:

· 90% women recognized that body shaming is a common behavior

· 84% participants reported that women tend to experience more body shaming as compared to men

· 47.5% women reported having experienced body shaming at their school or work place

· 32.5% women reported that their friends often tend to make negative comments about the way they look, be it in terms of their body weight, body shape, skin tone, hair, etc.

· 76% women felt that the media portrayals of beauty contribute towards promoting the prevalence of body shaming

· 90% women believed that films and television shows often do tend to make fun of people who do not conform to the standard norms and expectations

· 89% women reported feeling uncomfortable about their own selves when they read comments about other people’s appearances on social media platforms

· 28% women reportedly find it difficult to stand up for themselves when someone criticizes their physical appearance

· 31% participants reported that they sometimes don’t feel like facing the world because of what people would say about their physical appearance

· 66% women believed that it is important to look good in order to feel confident

· 62% women reported having felt anxious and nervous when people have commented on their looks and physical appearance

· 67% women also reported feeling angry because of body shaming

· 19% women reported feeling embarrassed about the way they look

· 46% women admitted having passed negative remarks or comments about people’s appearances without their knowledge

· 95% women believed that most people do not tend to realize that they indulge in body shaming

· 97% women believed that the issue of body shaming needs to be addressed in schools

Dr. Samir Parikh, Director, Mental Health and Behavioural Sciences, Fortis Healthcare said, “In the contemporary world, our perception of physical appearances tends to be significantly influenced by a multitude of factors, including the inevitable role played by the media, peer influences, as well as societal factors. Given such a context, it can be evidently understood how commonly many of us might experience a sense of dissatisfaction with our body image. And more so, it also creates a platform which encourages others to be able to judge or comment on a particular person’s body shape or size. Body shaming includes acts of sending provocative insults, and harassing others based on their inability to match up to the expectations related to stereotypical physical appearances, which can be in person, but is also becoming increasing prevalent through the internet.”

Dr Parikh adds, “Given the significant role of media influencing our perceptions of body image, be it the portrayals in films, television shows or other social media platforms, it is a common tendency for us to form comparisons which may not be realistic in nature, and as a consequence be unhappy with our body size or shape, or rather even feel dejected that we do not look like that particular model or actor/actress on the screen. In fact, such excessive comparisons based on the media portrayals can also create a sense of social pressure and competition to fulfil perceived demands and expectations of our physical appearance. Such social pressures can often be translated into a form of bullying known as body shaming.”

We all deserve to feel good about ourselves. And in an attempt to reduce such prevalence of body shaming, there is a need to encourage media literacy, in an attempt to be equipped to recognize and assess the realistic quotient of whatever we are exposed to in the media. We all need to work towards creating a sensitized and aware society who is able to respect one’s own as well as others’ body image.

लाइबेरिया निवासी 15 साल के मोहम्मद इब्राहीम मोरिंगा का जन्म श्सिकल सेल एनीमिया रोग के साथ हुआ। इस बीमारी में मानव शरीर की लाल रक्त कोशिकाएं असामान्य होती हैं । रोगी के शरीर में पानी की कमी के कारण यह असामान्य कोशिकाएं धमनियों में रुकावट पैदा कर रक्त के प्रवाह को बंद कर सकती है। इसी कारण साल 2008 में इब्राहीम को मस्तिष्क में स्ट्रोक हुआ, और उसके शरीर के अंगों में शिथिलता आने लगी। पैरों से शुरू हूई कमज़ोरी धीरे.धीरे शरीर के ऊपरी अंगों में भी होने लगी और अंतत: वह शय्याग्रस्त हो गया। किसी भी प्रकार की शारीरिक गतिविधि करने में असमर्थ था और अपने सामान्य दैनिक कार्यो के लिए भी वह दूसरों पर निर्भर हो गया । इब्राहीम की इस अवस्था को देख उसके पिता उसका इलाज कराने के लिए भारत आएए जहां धर्मशिला नारायणा सुपरस्पेशियलिटी हॉस्पिटल के सीनियर डॉक्टरों द्वारा इब्राहीम का उपचार किया गया।

लम्बी अवधी से चली आ रही इस शिथिलता के कारण इब्राहीम की मांसपेशियों में काम करने की क्षमता समाप्त होने लगी और जोड़ भी विकृत हो गए। इब्राहीम की यह अवस्था मांसपेशियों में जकडऩ के काऱण हुई थी, जो असामान्य तंत्रिका नियंत्रण से होता है। इस अवस्था में आने से पहले अपने स्कूल में फुटबॉल खेलने वाला इब्राहीम अब अपने हाथ से एक निवाला खाने में भी असमर्थ हो गया था । इब्राहीम के पिता जो कि लाइबेरिया के एक राजनयिक है, अपने बेटे को इस हाल में देखकर बेह़द दुखी थे।
धर्मशिला नारायणा सुपरस्पेशियलिटी हॉस्पिटल के डॉक्टर आशीष श्रीवास्तव एचओडी एंड सीनियर कंसलटेंट, न्यूरो सर्जरी डिपार्टमेंट और डॉक्टर अभिनव गुप्ता, सीनियर कंसलटेंट न्यूरो सर्जरी बताते है कि हमने उसका इलाज बैक्लोफेन नामक दवाई से शुरू कियाए जो कि जकडऩ स्पास्टिसिटी को कम करती है। बैक्लोफेन के 25 माइक्रोग्राम का एक इंजेक्शन रीढ़ कि हड्डी के रास्ते मस्तिष्क में बहने वाले पानी ; सेरेब्रोस्पाइनल फ्लुइड में दिया गया। इस दवाई के पश्चात इब्राहीम अपने हाथ से कुछ खाने में सक्षम हो गया। वह ग्यारह साल के बाद अपने हाथों और पैरों से काम ले पाया। बैक्लोफेन की सफलता को देखते हुए डॉक्टरों ने इब्राहीम की रीढ़ में एक दवा वितरण पंप डाला जिससे बैक्लोफेन की अत्यंत छोटी मात्रा को निरंतर सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड में भेजा जा सके।
परिणामस्वरुप इब्राहीम के अंगो में निरंतर सक्षमता बढ़ रही है। अब इब्राहीम को मांसपेशियों की जकडऩ को कम करने की आवश्यकता होगी। गहन व्यायाम द्वारा शरीर के अंगो की क्षमता व नियंत्रण में लाभ होगा।