August 21, 2019
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Health

इस दिन को मनाने के पीछे उद्देश्य मच्छरजनित बीमारियों के प्रति लोगों को जागरूक करना है। मच्छरों के कारण ढेर सारी गंभीर और जानलेवा बीमारियां हो सकती हैं, जिनमें डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया, जीका वायरस आदि प्रमुख हैं।

कब मानते है मच्छर दिवस

सबसे पहले बात आती है कि मच्छर दिवस आखिर मानते कब है ? तो इसका जवाब है कि हर साल मच्छरों की याद में 20 अगस्त को विश्व मच्छर दिवस मनाया जाता हैं। अब आप कहेंगे कि ऐसा भी क्या हुआ है इस दिन जो हम मच्छरों को याद कर रहे है। तो आपको बता दे जनाब कि:

इस दिन पेशेवर चिकित्सक सर रोनाल्ड रास ने वर्ष 1896 में मलेरिया नामक जानलेवा बीमारी की खोज की थी। अच्छा इस बीमारी से जुड़ी हुई एक खास जानकारी यह भी है कि इस बीमारी के लिए रेस्पोंसिबल महिलाए होती है।

जी हाँ, सही पढ़ रहे है आप महिलाए…लेकिन महिलाऐं मतलब मादा मच्छर। लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं है कि आप नर मच्छर को अपना ब्लड डोनेट कर सकते है। वह भी आपके स्वास्थ्य के लिए खतरनाक ही होता है। तो जरा ध्यान से क्योकि मच्छर मेल हो या फीमेल, काटेगा तो बीमारी की ग्यारंटी हम लेते है।

कैसे होती है बीमारी

दरअसल सबसे पहले रुख करते है हम बारिश के दिनों की तरफ. तो यह ऐसा मौसम है जब मच्छरों के पनपने का सिलसिला डबल या कहे तो ट्रिपल हो जाता है। यही वह मौसम है जब बीमारियों के संचरण हेतु अनुकूल परिस्थितियां भी बन जाती है। वैसे तो दुनियाभर में मच्छरों की हजारों प्रजातियां पाई जाती है लेकिन कुछ ऐसी जो बहुत अधिक हानिकारक होती है। इनमे से जहाँ नर मच्छर पेड़-पौधों का रस चूसकर अपना जीवन यापन कर लेते है तो वही मादा मच्छर अपनी प्यास बुझाने के लिए मनुष्य का खून चूसती हैं।

जब मादा मच्छर खून चूसती हैं तब व्यक्ति में प्राण घातक संक्रमण संचारित होने लगता है और इसके चलते मनुष्य के शरीर में कई तरह की बीमारियां भी पनप जाती है जैसे डेंगू, मलेरिया, चिकनगुनिया, येलो फीवर आदि।

मच्छरों के काटने पर क्या करें और कैसे करें मच्छरों से बचाव

बारिश के मौसम में अक्सर शाम को बैठते ही मच्छर आपको घेर लेते हैं। इन मच्छरों के काटने से त्वचा पर तेज जलन और खुजली होने लगती है। मच्छरों के काटने से कई तरह की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। आमतौर पर ये मच्छर पानी में पैदा होते हैं। मच्छरों को दूर रखने के लिए आप कुछ उपायों को अपना सकते हैं इसके अलावा अगर मच्छर आपको काट लें, तो रोगों से बचने के लिए भी आपको कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है।

खुजली न करें

मच्छरों के काटने पर त्वचा पर तेज खुजली होती है मगर एक्सपर्ट्स की मानें, तो इसे खुजाना नहीं चाहिए। दरअसल जब मच्छर आपको काटते हैं और आप उस जगह को ज्यादा खुजाते हैं, तो इससे त्वचा में बैक्टीरिया प्रवेश कर जाते हैं, जो इंफेक्शन का कारण बन सकते हैं। खुजली मिटाने के लिए सबसे अच्छा तरीका ये है कि आप प्रभावित त्वचा को साबुन और पानी से धोएं। इस पर बर्फ रगड़ें या एंटी-इचिंग क्रीम लगाएं।

क्यों होती है खुजली और जलन

मच्छरों के काटने से शरीर में खुजली शुरू हो जाती है क्योंकि मादा मच्छर जब खून पीने के लिए अपना डंक आपके शरीर में चुभाती है, तो त्वचा की ऊपरी पर्त पर छेद हो जाता है। आपके शरीर में कहीं भी छेद हो, तो तुरंत खून का थक्का जम जाता है। अगर ये थक्का जम जाए, तो मच्छर खून नहीं पी सकेगी। इसलिए मच्छर अपने डंक से एक विशेष रसायन छोड़ते हैं, जो खून का थक्का बनने से रोकता है। जब त्वचा में ये रसायन पहुंचता है, तो रिएक्शन के फलस्वरूप उस जगह पर जलन और खुजली शुरू हो जाती है और वो जगह लाल होकर सूज आती है।

मच्छरों के काटने से कैसे बचें

मच्छरजनित रोगों से बचाव का सबसे अच्छा तरीका ये है कि मच्छरों को खुद से दूर रखा जाए। मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया और जीका जैसे रोगों को फैलाने वाले मच्छर दिन में काटते हैं। इसलिए इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है।

  • सुबह और शाम के समय घर से बाहर खुले में निकलने से बचें।
  • पूरी बाजू और पांव को पूरा ढकने वाले कपड़े पहनें।
  • मच्छरों से बचने के लिए जरूरी हैं कि उन्हें घर के आसपास न पनपने दिया जाए। ऐसे में घर के आसपास कहीं भी पानी इक_ा न होने दें। यदि घर के आसपास नालियां गंदी हैं,तो उन्हें साफ करवाएं।
  • इक_े हुए पानी पर या तो मिट्टी डाल दें या फिर पेट्रोल, केरोसिन इत्यादि डाल दें ।
  • घर में रखी हुई खुली टंकियां, बर्तनों, टायरों इत्यादि में पानी न इक_ा होने दें और खाने के सामान को हमेशा ढक कर रखें।
  • घर के कूलर, एसी, पानी की टंकी इत्यादि की ठीक से सफाई करें और कूलर के पानी में सप्ताह में एकाध बार केरोसिन, पेट्रोल या मच्छरनिरोधी दवाईयां डाल दें।

Slipped disc is a common problem, which affects approximately 1% of the population at any given time. It usually affects people between the ages of 30 to 50 years. It is more common in males and frequently occurs in people whose occupation involves frequent bending and lifting.

Disc is cushion like material between the numerous small bones of the spine column called vertebrae. This gelatinous material is enclosed in a fibrous capsule. Any tear in this capsule predisposes to prolapse of the disc. Prolapse of the disc causes compression of the nerve that lies very close to it. This problem is more common in lower portion of spine called lumbar spine.The slipped disc typically causes low back pain, which travels to buttock and further down to back of thigh and calf muscles.This leg pain is also called as Sciatica because it radiates along distribution of sciatic nerve. This pain increases on sneezing or straining, walking etc. Pain may be accompanied by numbness or weakness in leg muscles and in severe situations bladder and bowel disturbances.

Slipped disc, is not only cause of backache/leg pain  but many other diseases can cause it like spinal tumor, infection, T.B, cancer spreading to spine, osteoporosis, arthritis, spinal stenosis, fractures, congenital diseases etc.

We should not forget that even abdominal tumors and infections can also cause backache and leg pain and numbness. The known factor causing backache are lack of exercises and physical fitness, bad posture, smoking, heaving lifting, bending, twisting, prolonged sitting, anxiety, depression, various games like gymnastics, tennis, football etc. and genetic.

In recent years, MRI scanning is becoming available more easily and is the preferred diagnostic test for spinal problems. MRI scan can clearly show the site and amount of disc prolapse and the nerve compression. Majority of patients respond to the non-surgical treatment. Non-surgical treatment is given in the form of bed rest, medicines to reduce pain and swelling. Physiotherapy is gradually started. Surgery is required in 10-20% of patients whose pain persists after conservative treatment or who have paralysis or bladder and bowel dysfunction from beginning.

Now a day, the operation for slipped disc can be performed through a tiny (about 1.5 cms) incision in the back with the help of an endoscope. Patients can go back home in 12-24hr and patients are usually very comfortable after operation and they can start walking or going to toilet same day. They can go back to their work in a few days. Generally people are very scared of spinal surgery because of risk of getting paralysed, bed ridden or dependent after operation. They would prefer to suffer rather than getting themselves operated and cured. But with modern surgical techniques such complications are extremely rare.

Human spine is made up of 33 bones calls vertebrae and between each two bones is a soft rubber like disc,which is jelly like in the centre and acts as a shock absorber for the spine and also gives flexibility to the spine. In the centre of the spine runs a canal,which contains the spinal cord. Spinal cord is a big nerve coming from the brain and its branches go into hand and legs.These nerves get compressed,when the disk slips back into the spinal canal and the problem of backache and leg pain starts.Besides slip disc other lesions can also press the nerves and cause similar symptoms like tumors,infections,deformaties etc. hence a proper diagnosis is essential for the treatment.

DR. SATNAM SINGH CHHABRA

Chairman, Neuro & Spine Department, Sir Ganga Ram Hospital,

New Delhi



नई दिल्ली : डायबिटीज के रोगियों के लिए: जिन मरीजों को डायबिटीज(Diabetes) की बीमारी है उनको गुर्दे की बीमारी होने की काफी सम्भावनाएं रहती हैं। आकड़े बताते हैं कि डायबिटीज (Diabetes) गुर्दे फेल होने का एक प्रमुख कारण है। इसलिए डायबिटीज (Diabetes) के रोगियों को शुरूआती लक्षणों का ज्ञान होना अति आवश्यक है। अगर रोगी के परिवार में किसी निकट सम्बन्धी के पूर्व में डायबिटीज से गुर्दे खराब हो चुके हैं तो उसके भी गुर्दे खराब होने की सम्भावना बढ़ जाती है।
नारायणा सुपर स्पेशियालिटी हॉस्पिटल के नेफ्रोजिस्ट डॉ.सुदीप सिंह सचदेव का कहना है कि वे लोग जो कि डायबिटीज (Diabetes) के मरीज हैं, उनमें से लगभग आधे लोग किडनी समस्या से पीडि़त हैं। इन लोगों के लिए आवश्यक है कि वे अपनी नियमित जांच कराएं और किडनी जांच पर विशेष तौर पर ध्यान दें। डायबिटीज से होने वाली किडनी समस्या का उपचार उपलब्ध है, बशर्ते समय रहते उसका निदान किया जा सके। अपने शुगर लेवल को नियंत्रण में ही रखें। आप का रक्तचाप जितना कम होगा आप की किडनी की कार्यशैली भी उतनी देर से ही दुष्प्रभावित होगी। हालांकि बहुत से लोगों को यह पता है कि उच्च रक्तचाप से हार्ट अटैक, ब्रेन अटैक हो सकता है लेकिन बहुत कम लोगों को ही यह मालूम है कि इससे किडनी को भी नुकसान पहुंच सकता हैै, विशेषकर उन केसों में जहां पीडित दिल की समस्या व डायबिटीज से पीडि़त होता है। गुर्दे की बीमारी के प्रारम्भिक लक्षण क्या हैं अगर रोगी को निम्नलिखित लक्षणों में से कोई भी लक्षण दिखाई देता है तो तुरन्त गुर्दे के डाक्टर से सम्पर्क करें.
डॉ.सुदीप सिंह सचदेव के भारत में टाइप-2 डायबिटीज (Diabetes) विकसित देशों की अपेक्षा कम उम्र में लगभग एक दशक पहले हो जाती है। डायबिटीज शुरुआत में ज्यादातर सुप्तावस्था में होती है, लगभग हर बारहवां शहरी भारतीय वयस्क मधुमेह रोगी है। हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं कि भारत में स्थिति कितनी भयावह होगी। इस रोग से ठीक से निपटने के लिए हर 2 लाख की आबादी पर एक विशेषज्ञ चिकित्सक होना चाहिए। हमारे देश के दक्षिण भाग में प्रशिक्षित विशेषज्ञ उत्तर की अपेक्षा कहीं अधिक हैं। भारत में पिछले दो दशकों में तेजी से हुए शहरीकरण तथा बदलती जीवनशैली के परिणामस्वरूप हमारे खानपान में आए परिवर्तन फास्टफूड, कोकाकोलोनाइजेशन, शारीरिक श्रम में कमी, भागदौड़, स्पर्धग्रस्त जिन्दगी से उत्पन्न तनाव इसकी महत्वपूर्ण वजह है। ब्लड प्रेशर का होना, मुँह पर सूजन आना, पेशाब में प्रोटीन जाना, पेशाब में खून का आना आदि।
डॉ.सुदीप सिंह सचदेव का कहना है कि अगर किसी मरीज को रक्तचाप की बीमारी है तो उसे नियमित दवा से ब्लड प्रेशर की 120 से 30/70-80 तक कन्ट्रोल करने पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि अगर ब्लड प्रेशर बढ़ा रहता है तो गुर्दे खराब हो सकते हैं। इस बीमारी में भी पेशाब में प्रोटीन आना शुरू हो जाती है। ब्लड प्रेशर भी डायबिटीज (Diabetes) के बाद गुर्दे खराब करने का एक प्रमुख कारण गुर्दे फेल हो जाने पर आने वाले लक्षण देर से आने वाले लक्षणों में भूख में कमी, उल्टी होने की सम्भावना लगना या उल्टी होना, शरीर में खून की कमी, थकावट रहना तथा ब्लड प्रेशर का होना आदि हैं। जो गुर्दे फेल होने की तरफ  इशारा करते हैं।

40-yr-old woman gets a new lease of life at Max Hospital, Shalimar Bagh through Organ Donation

Organ donation by one brain dead patient saved 6 lives simultaneously

World Organ Donation Day 2019 – 13th August 2019

New Delhi, 13th August, 2019: Forty-year-old, Ms Meenakshi Kamboj suffering from stage 4 chronic kidney disease, successfully underwent her second Kidney Transplant on 17/02/2017 through cadaver organ donation and received a new lease of life at Max Hospital Shalimar Bagh.

While Max Hospital, Shalimar Bagh was looking for a donor for Ms. Meenakshi, a patient of 45 Years/male, who was declared brain dead on 16/02/2017, the family was counselled about the possibility of Organ Donation and saving several lives. The family, in an extraordinary gesture of compassion and generosity decided to donate organs of corneas, Kidneys & Liver and the donation not only gave lease of life to Ms. Kamboj, but also saved 5 other lives.

Organ donation remains an issue especially in Northern India, plagued with multiple perspectives and myths, and there is dire shortage of donors. This noble act by the donor’s family, helped Max Healthcare and some other hospitals save 6 lives.

Ms. Kamboj’s life took a devastating turn when her first kidney transplant done on 1999, failed in 2014 and she had to undergo dialysis procedure in 2015. After the first kidney transplant failure, where the donor was her mother, she lost all her hopes of life as she didn’t have any other suitable donor in her family. She registered herself with Max Shalimar Bagh for Cadaver Transplantation on 16th January, 2016.

Speaking on the organ donation happened at Max Shalimar Bagh, Dr Waheed Zaman, Principal Consultant, Urology & Renal Transplantation, Max Super Speciality Hospital, Shalimar Bagh, shared, “After the case of Cadaver donor, came to us and was declared brain dead, the final process of organ donation was initiated by the hospital honouring the family’s wishes as our focus and all protocols were followed to maintain saturation for the donor alongside. And, after complete diagnosis, the patient’s kidneys were the best suitable for Ms. Kamboj’s transplant. Ms. Meenakshi was not only suffering from stage 4 chronic kidney disease but also accompanied with hypertension, anaemia and ESRD. Hence, thorough evaluation was done including cardiac evaluation, blood tests including HLA cross match with the cadaver donor which was negative. Treatment was started with IV fluids, IV antibiotics and other supportive medication and haemodialysis was done. She was taken for cadaver transplant surgery after anaesthesia clearance and the kidney transplantation was done within an hour of harvesting. Patient responded well to the given treatment and was discharged in stable condition with follow up advice. Presently patient is doing well for since more than two years of transplant, and has started her routine life.” 

Also, part of the team, Dr Rajat Arora, Consultant, Urology, Max Super Speciality Hospital, Shalimar Bagh, also added, “Medical advances in the field of transplant immunology, surgical management and donor maintenance have made the transplantation of vital organs possible and effective from deceased donors. We still have a long way to travel but at least, such donations set forth a good example for the society. We would like to laud the heroic act of all our donors from the past as well as thankful to Donor’s family for being able to take such a bold decision despite their irreparable loss.”

मोटापा आजकल हर किसी के लिए एक बड़ी मुसीबत की तरह है हर किसी को एक पतला और स्वस्थ शरीर चाहिए इसी मुसीबत से निजात पाने के लिए सर गंगाराम सिटी हॉस्पिटल में एक नए कार्यक्रम की शुरुआत हुई है। इसे एंडोस्कोपिक स्लीव गैस्ट्रोप्लास्टी मेेडिकल ट्रीटमेंट प्रोग्राम कहा गया है। इस तकनीक में ना कोई ऑपरेशन होगा और ना ही कोई चीर फाड़ और मोटापे की जो समस्या है वह बिल्कुल छूमंतर हो जाएगी।सर गंगा राम हॉस्पिटल के इंस्टीट्यूट ऑफ मिनिमल एक्सेस, मेटाबोलिक और बैरिएट्रिक सर्जरी विभाग के वाइस चेयरमैन डॉक्टर विवेक बिंदल बताते हैं कि आज अंगिनत  लोग मोटापे से ग्रस्त हैं और यह तकनीक उन सभी लोगों को लाभदायक होगी।

एनसीआर में इस प्रक्रिया के लॉन्च होने के बाद मोटापे से पीड़ित रोगियों को असरदार नतीजों के साथ अत्याधुनिक उपचार प्रदान करने में सक्षम हो गए हैं. उन्होंने बताया कि अब मरीजों को एक ही जगह पर डॉक्टरों की अच्छी टीम के साथ वजन घटाने की सभी सेवाएं मिल जाएंगी.

डॉ. बिंदल ने बताया कि पिछले 10 वर्षों में वजन घटाने के 1500 से अधिक मरीजों का सफल उपचार किया गया है. उन्होंने कहा कि एंडोस्कोपिक स्लीव गैस्ट्रोप्लास्टी कार्यक्रम शुरू होने के बाद वजन घटाने की प्रकिया में और फायदा मिलेगा, जिससे मरीजों को उचित लाभ मिल सके.एंडोस्कोपिक वजन घटाने की एक प्रक्रिया है. जिसमें जो मुंह के माध्यम से पेट में दूरबीन डालकर पेट के आकार को कम करके सिलाई कर दी जाती है. इस प्रकिया में न तो टांके लगते और न ही किसी तरह की चीर-फाड़ होती. मरीज को एक दिन में ही हॉस्पिटल से डिस्चार्ज कर दिया जाता है, जिसके बाद वो आराम से अपने घर जा सकता है. ये वजन घटाने की सर्जरी के क्षेत्र में डॉक्टरों की यह नवीनतम प्रगति है.

इसमें बिना किसी सर्जरी और निशान के ही वजन घटाने की प्रकिया को अंजाम दिया जाता है. इस प्रक्रिया में अपोलो ओवरस्टिच डिवाइस का उपयोग किया जाता है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका में एफडीए द्वारा अनुमोदित है. इसके माध्यम से 50 किलो तक का वजन कम किया जा सकता है. इस प्रक्रिया से मधुमेह, उच्च रक्तचाप, स्लीप एपनिया, जोड़ों में दर्द, बांझपन और मोटापे जैसी बीमारियों से भी निजात मिलेगी.

Gwalior: With the advent of monsoon that brings along a handful of disease, there is an increase in the cases of orthopaedics and kidney infections. Though irrespective of age barrier all people are equally vulnerable, but patients especially in the elderly population, undergone treatment for kidney problems or joint related ailments need special attention.

In order to assist the patients in Gwalior, Fortis Hospital Vasant Kunj conducts regular monthly OPD’s for Orthopaedics and Nephrology, at Kailash Hospital, Gwalior.

Weather-related joint pain is usually seen in patients with osteoarthritis and rheumatoid arthritis and most commonly affects hips, knees, elbows, shoulders and hands. The joints contain sensory nerves called baroreceptors that can detect barometric changes. The receptors especially react when there is low barometric pressure, such as before a rain storm may occur.

“People with arthritic joints seem to be more sensitive to the barometric changes. High humidity combined with low barometric pressure are also associated with increased joint pain and stiffness although either one could be a factor. Physical activity and exercise have been shown to benefit people with arthritis by improving pain, function and mental health. By partaking in low levels of exercise, individuals with arthritis face placing themselves at risk of conditions associated with lack of activity such as cardiovascular disease, diabetes, obesity and functional limitations.” Said Dr Vishwadeep Sharma, Consultant, Orthopedics, Fortis Hospital, Vasant Kunj, New Delhi.

Today’s generation leads a sedentary lifestyle – long hours are spent sitting in the same position, mostly in a wrong posture, at workplaces. In addition, late night shifts, smoking, long hours in front of the computer and irregular eating habits are making orthopaedics and renal ailments, a more common disease during the rainy season.  As a result, relatively younger people are developing such ailments and the age bracket has come down by atleast 5-7 years.

“The sudden change in the temperature causes a reduction in the body’s immune system and makes it more vulnerable to infections. Monsoon is the apt condition (being hot and humid) for the bacteria to prosper abundantly. During the humid conditions, cleanliness and personal hygiene of the private parts are of extreme significance, as avoiding them may lead to kidney infections, damage and scarring. Kidney scarring is very common and can lead to high blood pressure and impaired kidney functions later in life.” Said Dr Tanman Pandya, Consultant Nephrology, Fortis Hospital, Vasant Kunj, New Delhi.

The best advice is to be as proactive as possible – all year round, regardless of the weather. Drink plenty of water, and keep the joints active by doing non-weight bearing exercises and stretches. If this disease is found out at the early age then medication can cure it faster. But, if found at a very advance stage, it can lead to complications and surgical intervention.

“It is feasible to prevent kidney infections especially during monsoon season by following certain measures. Drinking plenty of fluids like water, fresh juices and soups will increase the urine flow and reduces the chances of infections. Consume lot of seasonal fruits and avoid holding urine for a long time.” Added Dr Pandya

रांची, 31 जुलाई, 2019ः फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट, गुरुग्राम के डॉक्टरों ने रांची के 60 वर्षीय मरीज़ श्री लाल मणि महतो का सफलतापूर्वक उपचार किया जो क्रॉनिक माएलोमोनोसाइटिक ल्यूकेमिया (सीएमएमएल) से पीड़ित थे जो ब्लड कैंसर का ही एक प्रकार है जिसकी कोई निश्चित दवा उपलब्ध नहीं है। मरीज़ को बुखार, कम हीमोग्लोबिन, वजन कम होने और कम होते प्लेटलेट्स की शिकायत के साथ फोर्टिस गुरुग्राम में लाया गया था। डॉ. राहुल भार्गव, निदेशक, हेमेटोलॉजी एंड बीएमटी, फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट, गुरुग्राम और उनकी टीम ने मरीज़ का सफल बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया।

श्री लाल मणि महतो को अग्रिम स्तर के ब्लड कैंसर की शिकायत के साथ अस्पताल लाया गया था। उन्हें अग्रिम स्तर के कैंसर के लिए कीमोथेरेपी दी गई। श्री महतो का वज़न काफी तेज़ी से कम होने लगा। इस बीमारी के कारण का पता नहीं था, रांची में एक डॉक्टर से सलाह लेने पर पता चला कि उन्हें खून का नुकसान हो रहा था लेकिन उसका कारण पता नहीं चल सका। मरीज़ के खून का स्तर नियंत्रित करने के लिए उन्हें फोलिक एसिड दिया गया लेकिन मरीज़ की स्थिति और खराब होने लगी। जल्द ही हर 20 दिन में उनके ब्लड ट्रांसफ्यूज़न की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई। रांची में कई डॉक्टरों से सलाह लेने के बाद उन्हें ब्लड कैंसर का पता चला। उनकी समस्या का एकमात्र समाधान बोन मैरो ट्रांसप्लांट था। उन्हें डॉ. राहुल भार्गव के पास लाया गया जिन्होंने सफलतापूर्वक सर्जरी की।

डॉ. राहुल भार्गव, निदेशक, हेमेटोलॉजी एंड बोन मैरो ट्रांसप्लांट, फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट, गुरुग्राम ने कहा, “ब्लड कैंसर का पता चलना मुश्किल है, दूसरी बात यह कि एक बार पता चलने पर भी कोई दवा नहीं है और बीएमटी ही एकमात्र उपाय है। बीएमटी की प्रक्रिया शुरू की गई, आरबीसी, डब्ल्यूबीसी और प्लेटलेट्स को शरीर से बाहर निकाला गया। मरीज़ नवजात शिशु की तरह हो गया और उनमें संक्रमण का खतरा बढ़ गया। ऐसी स्थिति में मरीज़ को स्थिर करना एक चुनौती है। एक अन्य शरीर से स्टेम सेल को मरीज़ के शरीर में स्थानांतरित किया गया और सफल ट्रांसप्लांट के लिए शरीर का इसे स्वीकार करना ज़रूरी होता है। जहां तक बात डोनर की है तो इसमें कोई जोखिम नहीं होता है। डोनर को सिर्फ 300 मिली ब्लड स्टेम सेल दान करना होता है और इसमें डरने की कोई बात नहीं होती। मरीज़ बहुत ही भाग्यशाली थे क्योंकि आम तौर पर डोनर मैच 30 फीसदी होता है लेकिन इस मामले में बहन और भाई का मैच 100 फीसदी रहा। डोनर को डोनेशन के अगले ही दिन डिस्चार्ज कर दिया गया। मरीज़ को अस्पताल से सफलतापूर्वक डिस्चार्ज किया जा चुका है और वह सामान्य जीवन जी रहे हैं।”

मरीज़ श्री महतो ने कहा, “जब मैं फोर्टिस आया था तो मुझ में बहुत कम उम्मीद थी। मुझे हर 20 दिन में ब्लड ट्रांसफ्यूज़न कराना पड़ता था। मेरा परिवार मुझे हर दिन कमज़ोर होते देख रहे थे और मैं इस बारे में कुछ नहीं कर सकता था। जब डॉ. भार्गव ने मुझे उम्मीद दी कि बीएमटी के बाद मैं पहले की ही तरह अपना जीवन जी सकूंगा तो मुझे यह चमत्कार लगा। मेरी छोटी बहन के स्टेम सेल मैच हो गए और मेरी ज़िंदगी बच गई। जब मैं आईसीयू में था तो मेरी स्थिति बेहद गंभीर थी और मेरा परिवार आस छोड़ रहा था। फोर्टिस गुरुग्राम में डॉ. राहुल भार्गव की ओर से किया जा रहा सतत उपचार ही था जिसकी वजह से मैं आज सेहतमंद हूं और आसानी से अपनी रोज़ाना के काम कर पा रहा हूं।”

डॉ. ऋतु गर्ग, ज़ोनल निदेशक, एफएमआरआई ने कहा, “यह अस्पताल में आए सबसे चुनौतीपूर्ण मामलों में से एक था जिसमें मरीज़ को अग्रिम स्तर के कैंसर के साथ लाया गया था जो बहुत ही दुर्लभ है। इस मामले में कई जटिलताएं थीं और सर्जरी के बाद मरीज़ को स्थिर करना बहुत बड़ी उपलब्धि थी। मरीज़ की स्थिति जीवन के लिए घातक हो सकती थीं हालांकि चूंकि इस मामले पर बहुत ही अच्छे से नज़र रखी गई इसलिए ऐसी स्थिति से सफलतापूर्वक बचा जा सका। एफएमआरआई ऐसी जटिलताओं का सामना करने के लिहाज़ से सभी सुविधाओं से भरपूर है। अस्पताल में रक्त संबंधी सभी समस्याओं से निपटने के लिए व्यापक टीम और आधुनिक प्रौद्योगिकी की मदद ली जाती है। इस मामले से पता चलता है कि हम विभिन्न विशेषज्ञताओं की ओर से सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।”

पटना: स्ट्रोक एक ऐसी समस्या है जिसको लेकर लापरवाही दिखाना काफी भारी पड़ सकता है इसलिए इसकी तुरंत जांच कराना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। हेमरेज के कारण की पहचान और मरीज की हालत के आधार पर समय पर किया गया इलाज न सिर्फ उसकी जान बचा सकता है बल्कि उसके जीवन को भी बेहतर करने में सहायक होता है।

मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत में न्यूरोलॉजी के हेड और सीनियर कंसल्टेंट, डॉक्टर चंद्रिल चुघ ने बताया कि, “हेमरेज स्ट्रोक उस स्थिति को दर्शाता है जहां खून नसों से लीक होकर मस्तिष्क में भर जाता है और इसे इंट्रासेरेब्रल (मस्तिष्क में खून का लीकेज) और सबरचोनॉइड (मस्तिष्क टिशू के आस-पास खून का लीकेज) के रूप में विभाजित किया जाता है। हेमरेज के विभिन्न कारणों में एन्यूरिज्म, आर्टेरियो वेनस मालफॉर्मेशन (एवीएम), ट्यूमर, फिस्टुला और अन्य रक्तचाप संबंधी बीमारियां शामिल हैं। पिछले एक दशक में इंटरवेंशनल न्यूरोलॉजी तकनीक काफी विकसित हुई है और नए उपकरणों के आगमन के साथ एन्यूरिज्म और एवीएम का उपचार अधिक सुरक्षित और प्रभावी हो गया है। मिनिमली इनवेसिव न्यूरोलॉजिकल प्रक्रियाओं के जरिए रोगियों को सुरक्षित और प्रभावी उपचार के तरीके प्रदान किए जाते हैं ताकि वे अपने परिवार के साथ जल्दी घर जा सकें।”

ऐसा कई बार देखा गया है कि बिल्कुल स्वस्थ दिखने वाले व्यक्ति की सोते समय अचानक ही मृत्यु हो जाती है और लोगों को लगता है कि उसने आत्महत्या की है। जबकि इसका कारण ब्रेन ब्लीडिंग हो सकता है। मस्तिष्क में खून के बहाव के कारण धमनीविस्फार के टूटने से दुनिया भर में हर साल लगभग 5-6 लाख मृत्यु के मामले दर्ज किए जाते हैं। 50% से अधिक पीड़ित 50 वर्ष से कम उम्र के पाए जाते हैं और पुरुषों की तुलना में महिलाओं में ऐसे मामलों के विकास का जोखिम दो गुना अधिक होता है। धूम्रपान, उच्च रक्तचाप और मस्तिष्क धमनीविस्फार का पारिवारिक इतिहास महिला में इस घातक स्थिति को विकसित करने के जोखिम को और बढ़ा देता है।

डॉक्टर चंद्रिल चुघ ने आगे बताया कि, “ आज मिनिमली इनवेसिव अप्रोच उपलब्ध है जिसमें एक न्यूरोइंटरवेंशनिस्ट ओपन सर्जरी से बचने के लिए एंडोवास्कुलर साधनों द्वारा लेग ब्लड वेसल से एन्यूरिज्म का इलाज करता है। एक माइक्रोकेथेटर्स (एक बहुत पतली ट्यूब) को पैर की रक्त वाहिका के माध्यम से मस्तिष्क धमनीविस्फार में रखा जाता है, जिसे बाद में विशेष कॉयल के उपयोग से बंद किया जात है। इस प्रक्रिया को कॉयलिंग के रूप में जाना जाता है जिसके कारण मस्तिष्क में किसी प्रकार की समस्या नहीं आती है और इसके बेहतर परिणाम होते हैं।”

सभी एन्यूरिज्म का लगभग आधा हिस्सा टूट जाता है और अक्सर, केवल इसके टूटने से ही इसके मूल कारण का पता चल पाता है। अचानक शुरू हुआ घातक सिरदर्द, जिसे अक्सर “रोगी के जीवन का सबसे खराब सिरदर्द” के रूप में वर्णित किया जाता है, धमनीविस्फार का एक लक्षण है। लेकिन कई लोग सालों तक यह नहीं जान पाते हैं कि उनमें किसी घातक समस्या के कारक पनप रहे हैं। कई कारक धमनी की दीवार को कमजोर कर सकते हैं और मस्तिष्क धमनीविस्फार के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। ब्रेन एन्यूरिज्म बच्चों की तुलना मेंबड़ी उम्र के लोगों में अधिक आम है और पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक आम है। इस बीमारी के जोखिम के कारक कुछ लोगों में जन्म से ही मौजूद होते हैं और कुछ लोगों में समय के साथ विकसित होते हैं।

Hepatitis – Causes, Treatment & Prevention

The liver is the largest and vital organ that functions to perform 500 essential tasks, including detoxifying the blood and storing vitamins as well as producing hormones. The main job of the liver is to filter the harmful toxins and chemicals from the blood. Converting protein and sugar into useful substance, storing them and releasing them when required by the body is managed by the liver. The liver will be unable to perform these works if it gets affected. The functions of the liver get disrupted when it gets affected by Hepatitis.

Hepatitis is inflammation of the liver that causes infection and may cause serious damage to the organ and rarely can develop to fatality. Hepatitis can be the symptom of several diseases, including autoimmune. Viral infection causes Hepatitis, and at least five viruses can develop the condition. Hepatitis gets classified into five types- A (HAV), B (HBV), C (HCV), D (HDV), and E (HEV). HAV, HBV and HCV are the common types of the disease, while HDV and HEV are less common forms.

Viral Hepatitis gets cured without any treatment, but in some cases, the virus remains in the body and causes chronic infection. The causes of the different Hepatitis types vary. However, the symptoms of the types could be similar.

by Mr Satkam Divya, CEO, klinicApp
Symptoms:

Nausea, vomiting, loss of appetite, abdominal pain, diarrhea, fever, fatigue, joint pain, jaundice, dark-colored urine, and pale stools are few of the symptoms

As said, the causes of Hepatitis vary, but the prime causes include infection with viruses, bacteria, or parasites. The infection also is caused when the body mistakenly attacks the liver, which gets referred to as autoimmune diseases. Consuming alcohol, drugs, and other toxins also are the common causes of the illness.

Learning the types of Hepatitis is essential.

Hepatitis A and E are short-term viral infections which transmit to the body through water or food infected by fecal matter. Undercooked or raw food or food prepared or handled by persons with dirty hands are the primary reasons for spreading the infection. When the virus enters the body, it spreads through the bloodstream and enters the liver, which causes swelling and inflammation. Hepatitis A is contagious and easily transmits to others.

Hepatitis B is caused due to exposure to infected blood or through sexual contact with an infected person. The reasons also include coming in contact with vaginal fluid and semen. A newborn child may also inherit the disease from an infected mother.

Hepatitis C transmits to others when a normal person comes in contact with the blood of an infected person. The infection spreads when people share the same needles; especially while injecting drugs. The virus may also transmit to others if an infected person shares personal hygiene products like shaving razors or similar products. Hepatitis C rarely spreads during sex or childbirth.

Hepatitis D also spreads through blood contact, but the infection spreads when the person also is infected with Hepatitis B.

Hepatitis E is similar to Hepatitis A and is rare.

Diagnosing the condition and detecting the infection is the first step of treatment and prevention.

The chronic infection and inflammation result in extensive scarring of the liver (cirrhosis), which will impair the functions of the organ. Diagnosing and detecting the infection at the right time is essential. Spotting the symptoms, you need to diagnose the condition to learn the type and severity of the condition. Conducting laboratory tests, the doctor or certified medical practitioner will find the type and severity. The normal ways of diagnosing the condition include blood tests, liver biopsy, nucleic acid tests, paracentesis, surrogate markers, and Elastography. The type of treatment largely depends on the diagnosis report.

Acute Hepatitis infection will resolve on their own, which might take several weeks or months. However, the chronic condition will require treatment of antiviral medication. Though there is no particular treatment for the disease, supportive therapy and medication will improve the comfort levels and prevent the complication associated with the disease. The condition gets diagnosed based on the patient’s medical history and blood test.

Self-care is essential for treatment as well as prevention of Hepatitis.

  • A patient must take plenty of rest.
  • Staying hydrated is the key to minimize the symptoms and effects.
  • The person infected with the virus must also eat a balanced and nutritious diet.
  • Including high-calorie food in the diet chart is essential for persons having a poor appetite.
  • Avoiding alcohol is essential to protect the liver.

The common steps one should follow for prevention of Hepatitis are-:

  • Get vaccinated against HAV and HBV if you had missed the vaccination as a child.
  • Make sure to follow the proper rules of maintaining hygiene, like washing hands with anti-bacterial soap or fluid and clean water after using the bathroom or changing diapers of a child. Make sure to wash your hands clean before handling water or food.
  • Make it a habit to drink bottled or boiled or chemically water. Traveling to a new location, remain cautious about your food habit and consumption style.
  • Practicing safe sex is another way of preventing transmission of the virus from one person to another. Using condoms or other barriers will greatly reduce the risks of transmission.
  • Never use a syringe, needles, razors, or toothbrushes of another person.
  • Make sure to use gloves while performing first aid. Pregnant and nursing mothers must remain extra cautious as the infants get easily affected by the virus for low immunity power.
  • Seeking doctor advice and following the treatment measures can prevent transmission of the virus to the infant.
  • Consulting a certified doctor and seeking advice can help you to prevent the condition and control the effects.
  • Make sure to visit the doctor if you detect any associated symptom so that you can follow the measures before the virus leads to a chronic condition.