May 16, 2021
Art-n-Culture

लम्हों में देखा सपना ही जिंदगी है।

लम्हों में देखा सपना ही जिंदगी है।
मिट्टी के घड़ों में सिमटी सांसे ही जिंदगी है।।

चेहरे की झुर्रियों में बह आई जो ।
मिट्टी के घड़ो को तपा लाई जो।
चाकों के चलने से निकल आई जो।
पेशानी के पसीने से गुजर आई जो ।

वो गर्म सांसे अब आराम ढूंढती है।
मेरे देश की मिट्टी से जो बने है।
मेरे हाथों की छुअन से जो ढले हैं।
उन लम्हों का कद्रदान ढूंढती हैं।।

ये घड़े नहीं संस्कार है।
सदियों से चली सनातन की पहचान है।
आत्मनिर्भरता का छोटा पर दृढ़ आधार है।
परमवैभव के सपने का आकार है।।

सपने तो देखे सबने हैं।
कोशिश वाले हाथों को ढूंढती है।
जो लम्हों की फिक्र करे, जो हर पहचान की कद्र करे ।
चेहरे की झुर्रियों में सिमटी जिंदगी ।
हर इंसान में उस इंसान को ढूंढती है।

Vikram Gaur

लेखक – विक्रम गौड़
चित्र – नीरज गौड़

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