September 21, 2020
Politics

कबड्डी कबड्डी

कबड्डी धीरे-धीरे खेल के मैदान से विलुप्त होकर राजनीति के रण क्षेत्र में आ गई है। राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट दोनों ‘कबड्डी- कबड्डी’ बोल और खेल रहे हैं !

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत चाहते हैं कि विधानसभा का सत्र तुरंत बुलाया जाए जिसमें वे कोई भी विधेयक रखकर तेल की धार को जांच लें और यदि तेल की धार ठीक लगी तो तुरंत विश्वासमत भी रख दें। अभी तो विधायकों को सीधा बाड़े से विधानसभा भवन ले जाया जाएगा और विश्वास मत पारित होने के बाद उन सब को 6 माह के लिए आजाद कर दिया जाएगा।

सचिन पायलट को यह कंफर्ट है कि उनके साथ भागे हुए विधायकों की स्थिति उन महिलाओं की जैसी है, जो पति का घर छोड़ कर किसी ओर के साथ ‘ भाग ‘ गई हैं और इतने सारे दिन कहीं ओर बिताने के बाद उनकी ‘ घर वापसी ‘ की संभावना नहीं के बराबर है।

दूसरी ओर गहलोतजी की दिक्कत यह है कि उनके पास जो बहुमत है,उसमें अब ‘बेवफाई’ का मार्जिन नहीं है। वे तलवार की धार पर चल रहे हैं और जरा से धक्के से इस पार या उस पार गिर सकते हैं! मुख्यमंत्री के अनुसार विधायक 25 से 35 करोड़ ₹ में बिक रहे हैं। यह रकम इतनी बड़ी है कि 1947 के आसपास भी यदि इतना बड़ा ऑफर होता तो अनेक गांधीवादी नेता भी अपना पाला बदलकर जनसंघ में जा सकते थे ।

गहलोत जी की टीम का कोई भी विधायक कभी भी इस प्रलोभन में फंस सकता है। गहलोत जी की दुविधा अपने विधायकों को लंबे समय तक पकड़े रहने की है। मध्यप्रदेश में तो ‘ समर्थित मूल्य ‘ पर विधायकों की खरीद सरकार द्वारा बंद किए जाने के बावजूद कांग्रेस विधायक हाथ जोड़ कर कह रहे हैं कि मामा जी, हमें खरीद लीजिए ! मामा जी भी अब जरूरत नहीं होने पर भी कांग्रेस विधायकों को निराश नहीं कर रहे हैं।

राजस्थान के गवर्नर साहब को पता है कि यदि वे विधानसभा सत्र नहीं बुलाएंगे तो गहलोत साहब का ‘कबड्डी-कबड्डी’ बोल बोल के सांस पहले ही फूला हुआ है और इसके टूटने की पूरी संभावना है । सो वे इस खेल में गहलोत जी का साथ टूटने तक जल्दबाजी में सत्र नहीं बुलाएंगे।

कुल मिलाकर राजनैतिक कबड्डी का यह खेल बड़ा दिलचस्प हो गया है।

सचिन पायलट का ग्रुप दल बदल विरोधी कानून के चलते शर्माते- शर्माते कोर्ट गया था लेकिन कोर्ट ने तो उनके हाथ में नए अस्त्र-शस्त्र दे दिए।

कोर्ट ने बता दिया कि विचार भिन्नता ( dissent ) का अधिकार सबका है और दूसरा कहीं ऐसा तो नहीं कि कोई मुख्यमंत्री दल बदल विरोधी कानून के अंतर्गत ‘डिसक्वालीफाई’ करने की धमकी देकर अल्पमत होते हुए भी मुख्यमंत्री बना हुआ है!! ये दोनों ठोस तर्क कोर्ट जाने से पहले सचिन पायलट और उनके 50 लाख ₹ रोज वाले वकीलों को पता नहीं थे। गहलोत जी के वकील तो वैसे भी ‘काम के बदले अनाज’ वाले लगते हैं।

तो जनाब इंतजार करिए कि राजनीतिक कबड्डी के इस खेल में किसका सांस फूलता है और किसे रैफरी सीटी बजा कर पराजित घोषित कर देता है।

वेद माथुर
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