January 23, 2021
Politics

स्वार्थों की लड़ाई में किसान लाचार है

तालाब कि गहराई नापने के लिए तालाब में उतरना पड़ता है। जिस पर गुजरती है पीड़ा कि गहराई वही समझता है । स्वर्ग जाने के लिए खुद ही मरना पड़ता है।

ऐसी कई कहावते है जिनको हम बचपन से पढ़ते आये हैं । या यूँ कहें कि रटते आये हैं । पढ़ते समय उनका वास्तविक अर्थ समझ में आना मुश्किल हो जाता है । गहरी बातों का अर्थ समझने में समय या कुछ अचानक घटी घटना का महत्वपूर्ण योगदान होता है ।

आजकल घटने वाले किसान बिल से जुड़े घटनाक्रम को देखकर इन कहावतो का अर्थ कुछ कुछ समझ में आया।

सम्बंध किसान परिवार से रहा मगर एक पीढ़ी से सीधा जुड़ाव नहीं रहा । दादा जी के बाद पिता जी ने किसानी में सक्रियता को नहीं रखा इसलिए लम्बे समय से किसानी से सीधा जुड़ाव नहीं रहा । मगर समय सबसे बड़ा शिक्षक होता है । बदलते समय के साथ हम कई जटिल बातों जानते समझते हैं ।

बीते दिनों लॉकडाउन में समय व विचारों ने करवट ली व किसानी की ओर लौटने का निश्चय किया । एक निश्चय किया की किसानी को अपनाया जाए । अपने पारंपरिक काम को अपने जीवन का आधार बनाया जाये। तो उसको जानने की, उसको समझने की, अपनाने की एक लंबी प्रक्रिया शुरु हुई । इसके सभी पहलुओं को समझना शुरु किया। कुछ तकनीकी पहलू, कुछ सामाजिक पहलू, व कुछ सरकारी पहलु से सामना हुआ ।

अपनी ज्ञान इसी यात्रा के दौरान सामना हुआ किसान बिल से । इसके बारे में टीवी व समाचार पत्रों में बहुत आने लगा । टीवी समाचार पत्रों से सुन पढ़ कर ही इसके बारे में जाना । तभी अचानक से किसान आँदोलन शुरु हो गया । बिल के विरोध में किसान सड़कों पर आ गये । क्यों ? पता नहीं ।

जगह जगह प्रदर्शन, रैली आदि होने लगी । एक तरफ सरकार इस बिल को किसान के जीवन में क्रांति लाने वाला बिल कह रही है वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इसको काला कानून । क्यूँ ? कौन कितना सही, कितना गलत ? कोई भि पूर्णतया सही हो या पूर्णतया गलत हो इसकी संभावना बहुत कम है । गलत या सही का निर्णय परिस्थिति पर आधारित होता है ।

सबके अपने विचार, अपना आँकलन व अपने तथ्य होते हैं ।

हमेशा से सोचता था की सुई बनाने वाला भी अपने उत्पाद की कीमत वो खुद तय करता है । केवल किसान ही एक ऐसा प्राणी है जो अपने उत्पाद की कीमत ले लिए दूसरे पर् निर्भर है, जिसको MSP भी कहा जाता है।

पर जब सरकार कह रही है कि बिल ये सुनिश्चित करेगा कि किसान अपने उत्पाद की कीमत खुद तय करे । ये भी तय करे की किसको बेचना है तो विरोध क्यूँ ।

विरोध को देखते हुए एक असमंजस कि स्थिति बन गई की कौन सही कौन गलत । तो सोचा कि बिल को पढ़ा जाये, सुनी सुनाई बातों की जगह तथ्यों को जाना जाये । तो तत्काल किसान बिल कि प्रति कि व्यवस्था की। उसको अच्छे से पढ़ा तो जाना की वास्तव में बिल किसान के पक्ष में है । तो विरोध क्यूँ | तब निर्णय लिया कि चलो विरोध को समझा जाये ।

विरोध को समझना शुरु किया तो जाना कि इसके कई पक्ष हैं । मगर मुलत: चार पक्ष हैं : सत्ता पक्ष, विपक्ष, आढ़ती व किसान । पक्षों के इस चतुर्भुज के विस्तार में जाएँ तो और भी पक्ष है पर अभी ज्यादा विस्तार न करते हुये चार पक्षों की चर्चा करें ।

सबका अपना पक्ष है, अपना विचार है अपने तथ्य हैं । हर कोई अपनी अपनी जगह सही भी है, पर एक दूसरे से परस्पर तुलना करने पर गलत भी । यहाँ ये महत्वपूर्ण है की अगर सही है तो गलत कैसे ?

इस संदर्भ में सही गलत का पैमाना है – स्वार्थ ।

सबका अपना स्वार्थ है । अपने स्वार्थ को केंद्र में रख कर ही सभी अपनी रणनीति तय कर रहे हैं। यहाँ कोई युद्ध नहीं हो रहा मगर फिर भी मैं रणनीति शब्द का प्रयोग कर रहा हूँ क्यूँकि कई पक्षों के लिये अस्तित्व का प्रश्न है । वो विरोध नहीं अस्तित्व की, अपनी प्रसंगिगता की लड़ाई लड़ रहे हैं ।

सभी पक्षों को ध्यान में रखते हैं तो देखते हैं कि सरकार के पास और भी काम हैं, विपक्ष भी कोई और मुद्दा खोज लेगा विरोध करने का , आढ़ती के कई और काम हो सकते है या वो कर सकता है । मगर इन सबके बीच एक चौथा पक्ष है जो इस घटना का केंद्र होना चाहिये, वो है किसान । जिसके स्वार्थ में समाज का अस्तित्व टिका है  जिसके नाम पर सब हो रहा है । जो केवल फसल पर आधारित है । जिसको नयी फसल के लिये 4-6 महीने इंतजार करना पड़ता है । फिर अपने ही उत्पाद की कीमत तय करने से लेकर वास्तविक कीमत मिलने तक दूसरे पर निर्भर रहना पड़ता है ।

इस स्वार्थों की लड़ाई में किसान लाचार है । इस चतुर्भुज के तीन भुजाओं के बीच वो चौथी भुजा जिस पर चतुर्भुज टिका है, वो लाचार है, उसकी बाकी भुजाओं के संघर्ष को लाचारी से मूक हो कर देख रहा है कि उसके स्वार्थ के हित का क्या होगा । उसकी सुध कौन लेगा | अगर समय ही निर्णय लेगा तो कभी कभी निर्दयता पूर्ण भी हो सकता है । उसकी स्थिति को देखकर पुष्यमित्र उपाध्याय की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैओर लगता कि किसान उनकों याद करे व आत्मनिर्भर बने

छोडो मेहँदी खडक संभालो

खुद ही अपना चीर बचा लो

द्यूत बिछाये बैठे शकुनि,

मस्तक सब बिक जायेंगे

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे|

Writer:

Vikram Gaur

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