July 4, 2020
Bollywood

Pataal Lok – अभिव्यक्ति की आज़ादी (Freedom of Expression) के नाम पर स्तरहीन कार्य

पाताल लोक (Pataal Lok) तकनीकी रूप से अच्छी है, कहानी अच्छी है पर फिर भी जाने क्यूँ निर्माता अपने काम पर विश्वास ना करके विवाद पर विश्वास करते हैं | और विवाद भी भावनात्मक विषयों पर , मान्यताओं पर उठाते है | नाम दिया जाता है अभिव्यक्ति की आज़ादी – Freedom of Expression |

दुनिया में कई शब्द ऐसे हैं जिनकी परिभाषा व दायरा क्या हो, इस पर कई तरह के सवाल उठाए जाते रहे हैं और आगे भी उठाए जाते रहेंगे | इस अपूर्ण व असीमित परिभाषा का फ़ायदा उठा कर सभी अपने विचार रखते रहते हैं |

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता Freedom of Expression , धार्मिक भावना ऐसे ही कुछ शब्द है जिनका फ़ायदा हम सभी समय समय पर उठाते रहते हैं | मनोरंजन जगत या कहें की फिल्म जगत इसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा उठाता है | कला की अन्य विधाएँ भी पीछे नहीं है | नंगे पाँव घूमने वाला एक पेंटर इस बात का सबसे बड़ा उद्धरण है | वैसे तो विश्व के अलग अलग देशों में ये काम अलग अलग तरीके से होता है | मगर भारतीय होने के नाते में बात भारत की ही करूँगा |

भारत के फिल्म व टीवी जगत ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का फ़ायदा उठाने का जैसे ठेका ले रखा है  | यहाँ वे ये भूल जाते हैं की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता Freedom of Expression का मतलब ये नहीं की किसी की भावनाओं का ध्यान ना रखा जाए | सामाजिक व धार्मिक मर्यादाओं का ध्यान न रखा जाए |

इसके सबसे ज़्यादा शिकार हिंदू /सनातन धर्म को मानने वाले लोग होते हैं | चाहे वो पद्मावत हो, पीके हो, या पैंटिंग हो | हिंदू धर्म के देवी देवताओं व मान्यताओं को निशाना बनाने का जैसे ठेका ले रखा है |

टीवी के निर्माता भी कम नहीं है | पौराणिक या ऐतिहासिक घटनाओं को तोड़मरोड़ कर दिखाना उन्होने अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझ रखा है | चाहे वो विष्णुपूराण (Vishnu Puraan) सीरियल के निर्माता हों , साईबाबा सीरियल के निर्माता हो या कोई और |

कुछ सालों पहले Amir Khan नाम के प्राणी ने भी ऐसा ही किया था | उसके बाद पद्मावत के निर्माता ने भी ऐसा ही किया | ऐसी ही कोशिश हाल ही में बनी फिल्म पाताल लोक (Pataal Lok) में पीके की कलाकार अनुष्का शर्मा ने की है |

फिल्म को हिट करने के लिए विवाद पैदा करना व भावनाओं को ठेस पहुचाने के टोटके को अपनाना जैसे चलन सा हो गया है |

क्या ज़रूरी है , जनेऊ को पहन कर व्यभिचार का दृशय दिखाना | जिस जनेऊ का इतना सम्मान होता है की किसी भी अशुद्ध काम के समय जनेऊ नहीं पहना जाता , चाहे वो पाखाना जाना ही हो |
भारतीय पौराणिक इतिहास में सावित्री एक सम्मानित नाम है | फिल्म में ये नाम एक कुतिया का रखा जाना क्या ज़रूरी है | मंदिर में अशुद्ध कार्य दिखाना , कहाँ तक ज़रूरी है |

सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है की फिल्म के लेखक भी ब्राह्मण है और निर्माता भी ब्राह्मण है | दोनों ने ब्राह्मण की भावना को निशाना बनाया क्योंकि दोनो अच्छी तरह जानते हैं की ब्राह्मण समुदाय कभी सड़क पर नहीं उतरेगा |

तभी ब्राह्मण समुदाय पर कलंक के समान हैं ये दोनो अनुष्का शर्मा व प्रदीप शर्मा, इन दोनो ने ये काम किया है | अनुष्का के पास कुतिया का नाम रखने के कई विकल्प थे | वो उसका नाम अनुष्का या अशहिमा रख सकती थी या कुतिया की जगह कुत्ता ले कर उसका नाम Virat या Ajay रख लेती या प्रदीप रख लेती |

जनेऊ पहने व्यक्ति को पहले Army का कर्नल दिखा सकती थी | पर इस publicity की प्यासी निर्लज्ज लड़की ने सावित्री नाम रखा |

भारतीय समाज में हर पवित्रता नारी को सावित्री के समान समझा जाता है | जब भी नारी के श्रेष्ठ आचरण के बारे में बात होते है तो एक नाम सावित्री का होता है |

मगर फिल्म लिखते समय ये नहीं सोचा गया | कब तक ये लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ऐसे काम करते रहेंगे | अगर फिल्म उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है तो ये लेख मेरी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है |

मेरा अनुष्का शर्मा से कहना है की अगर उसने हिंदू धर्म के अलावा किसी और धर्म को निशाना बनाया होता तो उनके साथ क्या होता वो सोच भी नहीं सकती , अनुष्का तो क्या उनके जैसे दूसरे प्राणी जैसे आमिर आदि भी नहीं सोच सकते | हम वैसा तो नहीं कर सकते हम दिल से उनको श्राप तो दे ही सकते हैं की …………….  | 

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