May 31, 2020
Politics

हमारे अमीर मंदिर और जनकल्याण

लॉक डाउन के बाद से हमारे देश में ये विचार कई लोगों के मन में आ रहा है कि कोरोना वायरस महामारी के इस दौर में यदि देश के सभी बड़े मंदिर अपनी जमा पूंजी सरकार को दे दें तो देश का भला हो जाए। जब यह प्रश्न आएगा तो इसका भारी विरोध इस आधार पर भी होगा कि यदि मंदिरों की पूंजी ली जा रही है तो मस्जिदों और गिरजाघरों की संपत्ति क्यों ना ली जाए ? और यदि इनके पास ज्यादा संपत्ति नहीं है तो फिर हिंदू मंदिर अपनी संपत्ति का त्याग क्यों करें?

स्वाभाविक है कि सरकार ऐसे किसी भी विवाद में कभी भी भूलकर भी नहीं पड़ेगी। दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि मंदिर अपनी सारी संपत्ति सरकार को दे भी दें तो हमारा मोटा प्रशासनिक तंत्र आम आदमी तक इसका लाभ पहुंचाते पहुंचाते 60- 70% तो खुद ही हजम कर जाएगा।
तो चलिए सबसे पहले हम देखते हैं कि हमारे देश के प्रमुख मंदिर कौन-कौन से हैं, जिनकी आय और अर्जित संपत्ति का अंदाजा लगाना भी आसान काम नहीं है ।

ये प्रमुख मंदिर हैं- पद्मनाभस्वामी तिरुअनंतपुरम , वेंकटेश्वर तिरुपति ,साईं बाबा शिर्डी, वैष्णो देवी मंदिर जम्मू ,मीनाक्षी मंदिर मदुरै ,जगन्नाथ मंदिर पुरी, काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी, अमरनाथ गुफा अनंतनाग, सबरीमाला पेरियार केरल।

मेरा अनुमान है कि इन प्रमुख मंदिरों की फिक्स डिपाजिट और सोने की कीमत 15 लाख करोड़ ₹ से कम नहीं होगी।
इन मंदिरों की संपत्ति यदि किसी उत्पादक कार्य में लग जाए तो देश की अर्थव्यवस्था में तेजी आ जाएगी। यह भी स्पष्ट है कि सरकार के बजाय निजी व्यक्ति संस्था या कंपनी द्वारा किए गए निवेश के तुरत-फुरत अच्छे परिणाम नजर आने लग जाते हैं ।

वेद माथुर का सुझाव है कि सरकार को एक ऐसी नीति बनानी चाहिए जिसके अंतर्गत इन मंदिरों को स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी,अस्पताल, सामुदायिक भवन , वन स्टार होटल , आवासीय व कमर्शियल कॉम्प्लेक्स आदि बनाने के लिए जमीन सुलभ कराई जाए अथवा यदि ये मंदिर कोई कृषि भूमि खरीदते हैं तो उसे 30 दिन के अंदर रूपांतरित कर दिया जाए।

सरकार ऐसा करती है और उससे ये सारे निर्माण शुरू हो जाते हैं तो इनसे ढेर सारे रोजगार तो सृजित होंगे ही साथ ही शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में मौजूदा लोगों का एकाधिकार भी कम होगा और लोगों को कम कीमत पर बेहतरीन सेवाएं मिलेंगी।

प्रसंगवश ,मेरा मानना है कि किसी भी कृषि विश्वविद्यालय के 50 से 60 किलोमीटर के दायरे में यदि हरियाली और औसत से दुगना उत्पादन नहीं हो रहा है तो उस विश्वविद्यालय का होना बेकार है। इसी प्रकार यदि किसी मंदिर के आसपास उसकी आय के अनुसार 50 से 500 किलोमीटर तक यदि कोई व्यक्ति रोटी या चिकित्सा के अभाव में कराह रहा है तो यह मंदिर के लिए दुर्भाग्यपूर्ण बात है।

आज जरूरत इस बात की है की मंदिरों को उनकी जमा पूंजी का इस प्रकार उपयोग करवाया जाए की संपत्ति पर उनका स्वामित्व बना रहे , रोजगार सृजित हो तथा बाद में अगले अनेक शताब्दियों तक लोगों को अच्छी शिक्षा ,चिकित्सा व आवासीय सेवाएं मिलती रहें।

वेद माथुर
www.vedmathur.com

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