May 25, 2020
Politics

क्या COVID-19 से सबक लेगी मोदी सरकार?

COVID-19 ने भारत में सरकारों और Private Sector के बीच की सांठगांठ की पोल खोल दी है। CORONA VIRUS से संक्रमित लोगों से Private Hospitals द्वारा मनमानी फीस वसूलने के कई मामले सामने आ रहे हैं। कई शहरों के Private Hospitals ने अन्य मर्ज के मरीजों को भर्ती करने से इंकार कर दिया।

देश में इस वक्त तकरीबन 70 फीसदी Health Sector की हिस्सेदारी Private Hospitals के हाथों में हैं और केवल 30 फीसदी हिस्सेदारी सरकारी अस्पतालों की है। मगर कोरोना संकट के वक्त सरकारी अस्पताल के CORONA WARRIARS पूरी निष्ठा और मजबूती के साथ कोरोना का सामना कर रहे हैं।

गौरतलब है कि केंद्र की मोदी सरकार ने The Disaster Management act 2005 लागू कर दिया था जिसके अनुसार Private Sector के संसाधन भी इस्तेमाल किए जा सके। सरकार ने कुछ Private Hospitals को कोरोना के इलाज के लिए अधिकृत किया था।

किस तरह देश का Private Sector हर वक्त सिर्फ और सिर्फ मुनाफे की सोचता है। इसके दो उदाहरण हमारे सामने हैं।

पहला, आठ अप्रैल को एक अदालती आदेश में कहा गया कि Private Lab कोरोना का Test मुफ्त करेंगे, लेकिन बाद में अदालत ने ही 13 अप्रैल को आदेश दिया कि Test के लिए 4500 रूपये देने होंगे। इसमें कोरोना संकट के वक्त Private Sector की लामबंदी साफ झलकती है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक यह Rate चीन, अमेरिका और बांग्लादेश से भी अधिक है। मुंबई के एक Lab के मालिक ने बताया कि वह एक हजार रूपये हर Corona Test से कमा रहे हैं।

दूसरा उदाहरण है कि Health-Emergency के इस दौर में भारत की Matrix Labs नामक कंपनी ने 245 रूपये प्रति किट के हिसाब से चीन से पांच लाख rapid antibody test kits import की और इसका कुल बिल 12 करोड़ 25 लाख रूपये आया। इसके बाद इसे Rare Metabolics Company को 21 करोड़ में बेचा और जिसने किट को Indian Council of Medical Research (ICMR) को 30 करोड़ रूपये में बेचा। मगर सरकार की तरफ से इस पर कोई आपत्ति नहीं जतायी गयी।

इस वक्त Health के दो मॉडल दुनिया के सामने है जिसमें पहला मॉडल Cuba का हैं, जहां चिकित्सा सुविधा मुफ्त होने के साथ सरकार के नियंत्रण में हैं। Cuba के डॉक्टर इस मुश्किल दौर में दुनिया के कई देशों में जाकर इलाज कर रहे हैं। वहीं दूसरा मॉडल USA का है जहां अधिकांश हिस्सेदारी Private Sector की हैं, जो कोरोना संकट के वक्त बुरी तरह चरमरा गया है।

बजट में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने जिला अस्पतालों को Public Private Partnership Model (PPP) के अंतर्गत विकसित करने की बात कही है। लेकिन कोरोना संकट ने Private Hospitals की मनमर्जी और पैसा कमाने की पोल खोलकर रख दी है।

देश के 2020—21 के बजट के Estimate में रक्षा पर 3,23,053 करोड़ रूपये, शिक्षा पर 99,311 करोड़ रूपये और स्वास्थ्य पर 67,484 करोड़ रूपये रखे गये है।

यह वक्त मोदी सरकार के आत्मचिंतन का वक्त है और देश की सरकार को सोचना होगा कि Cuba और USA में कौन सा मॉडल देश की जनमानस के लिए सही होगा? केंद्र और प्रदेशों की सरकार को यह भी सोचना होगा कि क्या प्राइवेट अस्पतालों का कोरोना संकट के वक्त कोई दायित्व नहीं हैं?

भारत में सरकार किसी व्यक्ति के 35 फीसदी इलाज का ही खर्चा देती है और बाकी का व्यक्ति को खुद उठाना पड़ता है। यह आंकड़ा अफ्रीका और एशिया के कई गरीब देशों के मुकाबले कमतर है।

लगे हाथ, आयुष्मान भारत योजना पर भी नजर डाल लेते है। यह गरीबों के लिए एक अच्छी योजना है, लेकिन इसमें तकरीबन 60 फीसदी हिस्सेदारी Private Hospitals की है। इसका सीधा सा मतलब है कि Taxpayers का पैसा घूम फिर कर Private Hospitals की झोली में जा रहा है।

मेरा मानना है कि हर प्रदेश में एक एम्स होना चाहिए, क्योंकि जिन प्रदेशों में AIIMS है वहां कोरोना के मरीजों की संख्या कम है। इसके साथ Division स्तर पर PGI अस्पताल बनाने का सरकार को लक्ष्य रखना चाहिए। सभी अस्पताल दिल्ली के AIIMS से Connect होने चाहिए जिससे आपदा के वक्त देश के नागरिक को बचाया जा सके।

कई प्रदेशों की राज्य सरकारों ने शराब की दुकानों को खोल दी है, क्योंकि राज्य सरकारों को सबसे अधिक Revenue शराब से मिलता है। इसके अलावा Property Tax, पेट्रोल — डीजल से मिलने वाला Vat और GST में राज्यों का हिस्सा प्रदेश सरकारों की कमाई का मुख्य जरिया है। इसमें सबसे अधिक कमाई शराब की Excise Duty से होती है।

गुजरात, बिहार, मणिपुर, नगालैंड और केंद्रशासित प्रदेश लक्षद्वीप में शराबबंदी है। इसके अलावा अन्य प्रदेश सरकारें Excise Duty शराब बनाने और बेचने पर लगाती है। वहीं कुछ राज्य शराब पर Vat भी लगाते है। इसके अलावा Important शराब पर कई तरह के Tax लगाये जाते हैं।

RBI के अनुसार राज्य सरकारों ने एक लाख 75 हजार करोड़ रूपये शराब के Tax से कमाये थे। Lockdown के बाद मोदी सरकार ने एक लाख 70 हजार करोड़ रूपये के राहत पैकेज की घोषणा की थी, जो शराब पर एक साल से होने वाली कमाई से भी कम है।

Lockdown बढ़ा तो दिल्ली में शराब पर 70 फीसदी का Tax लगाया गया, जबकि आंध्रप्रदेश ने 75 फीसदी अतिरिक्त Tax लगा दिया। दिल्ली को ही देखा जाये तो पिछले वित्तीय वर्ष में अप्रेल में दिल्ली सरकार ने करीब 3500 करोड़ रूपये शराब से कमाये थे, जबकि इस साल इस दौरान यह कमाई केवल 300 करोड़ रूपये थी।

Social Distancing की शराब की दुकानों के सामने धक्कामुक्की करके सरेआम धज्जियां उठायी जा रही है। ऐसे समय में लोगों को रोजमर्रा के सामान मुहैया कराना प्रदेश और केंद्र सरकार की Priority होनी चाहिए थी?

Deepak Sen- Senior Journalist

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