June 4, 2020
Politics

Whom to trust – किस पर विश्वास करें

खिँचों ना तीर कमानों को न तलवार चलाओ , जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो ||

इन दो लाइनों को कलम की ताक़त साबित करने के लिए कई बुधिजिवियों के श्रीमुख से सुना था| न केवल बोला वरन कई लेखों में इस दोहे को लेखनी को सजाने के लिए इस्तेमाल किया गया | ऐसी ही कई कहावतों को, दोहों को लेखों को लिखा गया पढ़ा गया| कई बहसों में पुख़्ता तौर पर साबित करने की कोशिश की गई की वास्तव में को कलम में बहुत ताक़त है | इतनी ताक़त की वो ना केवल ताकतवर से ताकतवर व्यवस्था को चुनौंती दे सकती है, उसको बदल भी सकती है | कलम निष्पक्ष है, निस्वार्थ है, निर्भय है, निर्लोभ है, ऐसा सैधान्तिक रूप में माना जाता है , सिद्धांत मतलब स्थापित सत्य |

जब इतिहास से, साहित्य से, लेखन से , समाचारपत्रों से, कला से परिचय होने लगा तो ऐसा लगा की कलम वास्तव में बहुत ताकतवर है|

मगर तस्वीर के दोनों ओर देखने की स्वाभाविक परवर्ती ने अलग विचार को जन्म दिया – की क्या वास्तव में ऐसा है | कलम की ताक़त का जो ज्ञान दिया जा रहा है कहीं वो हाथी के दाँत तो नहीं | जो दिखाया जा रहा है, समझाया जा रहा है क्या वो वास्तव में सच है या इसको कोई और अनदेखा, अनसुना पक्ष भी है |

जैसे जैसे इतिहास का अध्यन किया, ऐसा लगा की इतिहास की अधिकारिक पुस्तकों में जो हम पढ़ रहे हैं वो शासन की ओट में लिखा गया है | अगर नहीं तो ऐसा क्यूँ है की एक तरफ तो ग्यारहवीं शताब्दी में ईरानी लेखक अलबारूनी ने भारत में दी जाने वाली शिक्षा को बेहद उन्नत, उत्तम कोटि की लिखा वहीं दूसरी ओर अँग्रेज़ी शासन काल में उपजे इतिहासकारों ने हर ज्ञान का श्रेय अँग्रेज़ी शासन को व पाश्चात्य संसार को दिया |

इतिहास के इस बोध के बाद भी मन व बुधि में समानता नहीं हुई | मन मानने को तैयार ही नहीं हुआ की कलम किसी की अधीन हो सकती है | किसी राजा का गुणगान करना अलग बात है और राजा को बड़ा व महान बनाने की लिए सच ना लिखना अलग बात है, इससे भी अलग है चाटुकरिता वश या इनाम या धन के लालच में सच ने कहना |

फिर मन ने सोचा की अगर कलम आज़ाद है, ताकतवर है, भेदभाव से परे है तो क्यूँ महाकवि रामधारी सिंह दिनकर के लोकसभा में सत्ताधारी पार्टी के मुखिया व देश के प्रधानमंत्री नेहरू के काम की आलोचना के उदाहरण दुर्लभ हैं | क्यूँ कलम के सिपाही कवि कुमार विश्वास को कलम की ताक़त को समझने का हर्जाना भुगतना पड़ता है | क्यूँ प्रश्न पूछने पर किसी चैनल के मुखिया को हमले का सामना करना पड़ता है |

ऐसी कई बातों के बीच  कुछ ऐसी बातें भी सुनने में आती है की खबर प्रायोजित हो सकती है | वातावर्ण ऐसा भी बनता है की एक व्यक्ति के बढ़ते राजनैतिक कद के विरोध में अचानक कुछ लेखक अलग अलग कारण बता का पुरस्कार वापिस करते हैं और कुछ  बुधीजीवी इस पुरस्कार वापसी को आडंबर घोषित करते हैं, और हैरानी तब होती है जब उस खास व्यक्ति के राजनैतिक कद को बढ़ने से कोई रोक नहीं पाता तो पुरस्कार वापसी की बातें अनायास ही गायब हो जाती है | वर्तमान में कलम का साथ टीवी भी दे रहा है इसलिए प्रिंट व एलेक्ट्रॉनिक मीडीया, दोनो को समान दृष्टि से देखना पड़ेगा |

यहाँ बेहद आश्चर्य तब होता है जब एक चैनल केवल सत्ता के पक्ष में खबरें दिखाता है  व दूसरा केवल विरोध में| क्यूँ कोई चैनल स्कूल में बोले जाने वाले मंत्रों के खिलाफ अंजान व्यक्ति द्वारा डाली गयी याचिका को राष्ट्रीय नेटवर्क पर महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बनाता है व कोई आतंकवाद में संवेदना खोजने लगता है |

निजी चैनल देखकर लगता है चारों तरफ अफ़रातफ़री मची है इसके विपरीत दूरदर्शन देख शांति का एहसास होता है |

यहाँ मन ये सोचने पर मजबूर हो जाता है की कौन इसको चला रहा है धर्म, अर्थ, भय या मोह |

किस पर विश्वास करें और कितना विश्वास करें |

लेखक – विक्रम गौड़

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