July 3, 2020
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योग : परमात्म मिलन का सच्चा और सहज मार्ग

सर्वप्रथम ‘योग’ और ‘योगा’ के अंतर को जानना जरूरी है। आमतौर पर अधिकांश लोग समझते हैं कि प्रातः कालीन की किए जाने वाले शारीरिक आसान और प्राणायाम ही योग कहलाते हैं। किंतु ऐसा नहीं है प्राणायाम और आसान ‘योगा’ के अंतर्गत आते हैं। इनके द्वारा केवल शारीरिक व्याधियां दूर होती हैं और ‘योग’ द्वारा अपने मन को बाहरी जगत से हटाकर परमात्मा से मिलन मानना है। यह एकाग्र साधना है। अनोखी यात्रा है। जो आत्मा का परम आत्मा यानी भगवान से मिलन का विशेष तरीका है। देखा जाए तो आत्मा का परमात्मा से मंगल मिलन ही सच्चा योग है और यह मिलन सर्वश्रेष्ठ होने के कारण ‘राजयोग’ कहलाता है।

‘राजयोग’ सभी योगों का राजा है। परमात्म योग के नियमित अभ्यास से हमारे अंदर दैवीय गुणों और संस्कारों की उत्पत्ति होती है। आत्मा पतित से पावन बनती है। संस्कार उच्च बनते हैं। मनुष्यात्मा के पाप दग्ध होते है। इस प्रकार का योग व्यक्ति को अपनी कर्मेन्द्रियों सहित मन का राजा भी बना देता है। राजयोग से आत्मा दिव्य गुणों और शक्तियों से भरपूर होकर सतोप्रधानता की ओर अग्रेसित होती है। डिप्रेशन यानी अवसाद को तो दूर करने की अचूक दवा है, ‘राजयोग’। बशर्ते अवसाद ग्रस्त व्यक्ति का अशांत, दुःखी और समस्याग्रस्त मन आहिस्ता-आहिस्ता परमात्म प्रेम की तरफ जुड़ जाए या किसी सहयोग युक्ति द्वारा इस तरफ मोड़ दिया जाए।

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अर्थात किसी तरह से उसे परमात्म आनंद की लगन लग जाए। वैसे यह सच है कि इस संसार में परमात्म आनंद से बड़ा कोई सुख नहीं होता। राजयोग नकारात्मक चिंतन से सकारात्मक चिंतन की ओर ले जाता है। राजयोग से सुख, आनंद, प्रेम और शांति के असीम अनुभव होने लगते हैं। योग का सामान्य अर्थ होता है जोड़, मिलन या संबंध।

वास्तव में दो वस्तुओं के संबंध को योग और विच्छेद को वियोग कहते हैं। संसार के सभी वस्तुएं विनाशी और क्षणभंगुर हैं। पर परमात्म मिलन यदि एक बार हो जाए तो वह स्थाई होता है। आत्मा का संस्कार बन जाता है। अत्यंत सुखद होता है। इसीलिए एक युग में शंकर जी से लेकर स्वामी विवेकानंद जी तक ने अपने जीवन में देवी-देवताओं की भक्ति से ज्यादा परमात्म योग पर ध्यान लगाया और एकांतवासी बन निरन्तर योग लगा कर सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा से दिव्य शक्तियां प्राप्त कीं और समाज का कल्याण किया।

योगा यानी शारीरिक क्रियाओं का मूल उद्देश्य शरीर को निरोगी रखना ही नहीं, बल्कि शरीर की समस्त असंतुलित हलचलों को शांत कर उसको परमात्म ‘ध्यान’ यानी ‘योग’ के लिए तैयार करना भी है। ध्यान माना योग। इसी क्रम में शरीर की शुद्धी के साथ-साथ खानपान की शुद्धी बहुत आवश्यक है। खानपान तामसिक नहीं, सात्विक होना चाहिए। जब परमात्म भोग में कभी भी तामसिक चीजों का भोग नहीं लगाया जाता तो उनकी संतान भी आखिर क्यों खाएं दूषित तामसिक भोजन।

ऐलोपैथी में जिस प्रकार कई इलाजों का कुप्रभाव होता है ठीक उसी प्रकार आयुर्वेद में कुछेक चीजों (प्याज-लहसुन आदि) को औषधि माना गया है, पर इनका कुप्रभाव किसी रोग के इलाज के साथ-साथ दूसरे अंगों विशेषकर कर्मेन्द्रियों पर भी पड़ता है। मनोदशा पर तो विशुद्ध विषम प्रभाव तक डालता है। विकारों में वेग उत्पन्न होता है। वैसे ध्यान-योग करने वाला व्यक्ति यदि कुछ समय तक दवा के रूप में तामसिक चीजों का सेवन करे तो बुराई नहीं है, मगर वह जीभ स्वाद की लत में नियमित प्रयोग करेगा तो उसका परमात्म ध्यान-योग पूर्ण रूप से कभी सार्थक नहीं होगा। ध्यान रहे कि घर में बनने वाला भोजन प्रसाद यदि तामसिक होगा तो उसे खाने वालों के अंदर तामसिक गुण ही पैदा होंगे। वह कभी सात्विक सतोगुणी नहीं बन सकता। इसलिए परमपिता परमात्मा को भोग लगाकर खाया जाने वाला भोजन कभी तामसिक नहीं होना चाहिए।

राजयोग द्वारा सहनशक्ति, सामने की शक्ति, परखने की शक्ति, निर्णय लेने की शक्ति, सामना करने की शक्ति, सहयोग की शक्ति, विस्तार को संकीर्ण करने की शक्ति और समेटने की शक्ति अर्थात अष्ट शक्तियों का विकास होता है। राजयोग मेडिटेशन यानी ध्यान द्वारा आत्मा के सात गुण ज्ञान, प्रेम, पवित्रता, सुख, शांति, आनंद और शक्ति में भरपूर असीम संपन्नता आती है।

ऐसे करें नित्य राजयोग का अभ्यास :

एकांत में बैठ जाएं। और चारों तरफ से अपनी बुद्धि को हटा कर अनुभव करें कि आप ज्ञान के सागर, प्रेम के सागर, पवित्रता के सागर सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा के बच्चे हैं। परमपिता परमात्मा चाहें उसे ईश्वर, अल्लाह, परवरदिगार या फिर वाहे गुरु कुछ भी कहो वही इस रंग मंच के क्रिएटर, डायरेक्टर और मुख्य एक्टर अर्थात सर्वशक्तिमान हैं। हम सब आत्माएं उनकी ही संतान मास्टर सर्वशक्तिवान हैं। वह सर्वशक्तिमान है, हम सर्वशक्तिवान हैं।

मन-ही-मन में संकल्प करें कि सफलता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, मेरे प्रत्येक कर्म में सफलता समाई हुई है। यह वरदान मुझे स्वयं सर्वशक्तिमान परमात्मा ने दिया है। मन में विचार करें कि मुझ जैसा कोई इस दुनिया में नहीं है। मेरे सिर पर तो सदा परमात्मा की छत्रछाया है। वह सदा मेरे साथ हैं और मुझे शक्तियों से भरपूर कर सार्थक कर्म करने हेतु प्रेरित कर रहे हैं। उनकी ओजस्वी तेजोमय किरणें मुझ पर पड़ रही हैं। मेरा संपूर्ण शरीर शीतल होता जा रहा है।

परमात्मा को दिल से धन्यवाद दें। अपनी सारी परेशानियों, जिम्मेदारियों, समस्याओं, चिंता और दुःख को परमात्मा को सौंप दें। अनुभव करें मेरा जन्म इस संसार में केवल महान कार्यों के लिए हुआ है। मुझे तो केवल दिव्य और श्रेष्ठ कर्म ही करने हैं। और बार-बार अनुभव करते रहें कि मैं आत्मा शांत स्वरूप हूं और शांति धाम की रहने वाली हूं। इस धरा पर अपना पार्ट अदा करने आई हूं। मैं यहां केवल श्रेष्ठ कर्म करने के लिए ही जन्मी हूं। और अजर अमर हूं।

फिर अपने समस्त संकल्पों और अनुभवों को धीरे-धीरे नियोजित करें और सुखद अनुभूति का अपने अंदर असीम विस्तार करें। जो हो रहा है वह भी अच्छा और जो नहीं हो पाया वो तो उससे भी अच्छा, ऐसा संकल्प करते हुए सदा निश्चिन्त रहें। आप राजयोग मेडिटेशन के बारे में अधिक जानकारी और इसका अभ्यास सीखने के लिए अपने नजदीकी ब्रह्माकुमारीज सेवा केंद्र पर जाकर संपर्क कर सकते हैं। यहां यह परमात्म राजयोग निःशुल्क सिखाया जाता है।

यहां पहले आप सात दिन का निःशुल्क कोर्स करें और फिर आप राजयोग का नियमित अभ्यास कहीं भी और किसी भी स्थान पर कर सकते हैं। किसी प्रकार की कोई बाध्यता नहीं है। बस, जरूरत है तो ज्ञान के इस सुखद और सहज राजयोग को सीखने के लिए निःसंकोच अपना पहला कदम बढ़ाने की।

डॉ. (इंजी.) आलोक सक्सेना,
( लेखक राष्ट्रीय मीडिया अधिकारी, प्रयोगधर्मी व्यंग्यकार एवं प्राकृतिक चिकित्सक हैं )

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